हिंदी सिनेमा में महिला सशक्तीकरण का दौर चल रहा है लेकिन आपकी फिल्मों की अभिनेत्रियां शुरू से ही आजाद ख्यालों की रही हैं। इस मजबूती का ख्याल आपको कहां से आता है?
दरअसल, मेरे आसपास अब तक जितनी भी महिलाओं को मैंने देखा है, चाहे वह मेरी मां हो या मेरी कोई चचेरी, ममेरी बहन हो, सभी काफी होशियार और मजबूत रही हैं। वह अपने फैसले भी खुद ले सकती हैं, और अपना काम भी करवा सकती हैं। मेरा यकीनी तौर पर मानना है कि औरतें मर्दों से ज्यादा होशियार होती हैं। वह किसी बात को मर्दों से पहले समझती भी हैं और अपना काम भी निकलवाना जानती हैं।
हिंदी सिनेमा में दीपिका पादुकोण एक मजबूत महिला का उदाहरण हैं, पिछली 'लव आज कल' से लेकर आज तक की दीपिका में आए बदलाव को एक निर्देशक के नजरिए से किस तरह देखते हैं?
दीपिका को मैं जब से जानता हूं वह मुझे तभी से लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने वाले व्यक्तित्व की महिला लगीं। जब उन्होंने फिल्मों में काम करना शुरू भी नहीं किया था तब से मैं उनके साथ काम करने की इच्छा रखता था। एक साधारण इंसान नहीं समझ सकता, लेकिन मैं एक निर्देशक के तौर पर बता सकता हूं कि दीपिका बहुत शर्मीली लड़की हैं। जब मैंने उनके साथ पहली फिल्म में काम किया तो वह किरदार को अपने पीछे छुपा लेती थीं, मैंने उनके अंदर से उस किरदार को कुरेदकर बाहर निकाला था।