नेटफ्लिक्स पर शुक्रवार से प्रसारित होने जा रही डॉक्युसीरीज ‘द हंट फॉर वीरप्पन’ को देखना, तमाम ऐसी जानकारियों से रूबरू होना है जो शायद वीरप्पन पर लगातार लिखते रहने वाले भी नहीं जानते होंगे। पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने से पहले जहां जहां वह रहा, वहां के गांव वालों को किन हालात से गुजरना पड़ा, या फिर लिट्टे (लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम) प्रमुख प्रभाकरण के पास शरण पाने की उसकी उम्मीद और इसी उम्मीद में उसका जंगल से बाहर आना, ये सब इस डॉक्यूमेंट्री को देखते समय सोचने को मजबूर करता है। चार हिस्सों में बनी इस डॉक्यूसीरीज के निर्देशक सेल्वमणि सेल्वराज ने इन्हीं सारे मुद्दों पर ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने ये एक्सक्लूसिव बातचीत की।
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द हंट फॉर वीरप्पन
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
वीरप्पन पर डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाने का ख्याल आपको पहली बार कब और क्यों आया?
एक शख्सियत के रूप में वीरप्पन से मैं हमेशा प्रभावित रहा। मुझे उसे लेकर बनी बिल्कुल विपरीत धारणाओं में भी दिलचस्पी रही। सरकार की नजर में वह एक खतरनाक अपराधी था लेकिन जहां वह रहता था वहां के लोग उसे प्यार करते थे। मैं इसी को लेकर भ्रमित रहा। फिर मैंने उसके ऊपर लिखे आलेख पढ़े, खबरें पढ़ी। उसके इंटरव्यू देखे और पढ़े और इस सबका मेरे ऊपर एक अलग असर हुआ। कोई पांच साल पहले मैंने वीरप्पन के बारे में गंभीरता से पढ़ना शुरू किया। एक किताब पढ़ी मैंने एसपीजी के अधिकारी रहे के विजय कुमार की, वीरप्पन: चेजिंग द ब्रिगैंड। इसमें पुलिस के नजरिये से पूरी कहानी है और ये कही इस तरह गई है जो पढ़ने वाले को सम्मोहित करती है।
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द हंट फॉर वीरप्पन
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और, इसके अलावा..
इसके अलावा मैंने तमिल में लिखी एक किताब पढ़ी जिसे कुछ वकीलों ने लिखा है, ये वीरप्पन के बारे में नहीं बल्कि जंगलों में रहने वाली जनजातियों के बारे में है। इसमें वीरप्पन का उल्लेख सिर्फ दो बार आया है लेकिन बहुत ही होशियारी से। और, इसे पढ़ने के बाद मेरे मन में वीरप्पन को लेकर उत्सुकता और बढ़ गई। जंगल में और वीरप्पन को शरण देने वाले गावों में रहने वाले लोगों के साथ उन दिनों क्या हुआ, मुझे नहीं पता था।
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आपका संदर्भ क्या उस तरफ है जहां गांव वालों से पूछताछ के लिए‘वर्कशॉप’ नाम का एक कथित यंत्रणा गृह बनाने की बात आती है?
ये भी, और सामान्य रूप से कहें तो उन सारे गांवों के बारे में भी। एक वांछित अपराधी था, ये सच है। लेकिन, धीरे धीरे मुझे एहसास हुआ कि ये कहानी सिर्फ उतनी नहीं है जितनी नजर आती रही है। इसकी तमाम परतें और भी हैं। बस, यही जानने की इच्छा ने इस डॉक्युसीरीज ‘हंट फॉर वीरप्पन’ को जन्म दिया। जब मैं इन लोगों से मिल रहा था तो मुझे इस बात का एहसास हुआ कि ये बातें बताई जानी जरूरी हैं।
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- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
तो आपको कितने साल लगे इस डॉक्युसीरीज को बनानेमें?
दो साल मैंने सिर्फ इसके शोध में बिताए और दो साल लगे मुझे इसकी शूटिंग पूरी करने में। हमने हर शोध को भली भांति परखा, जांचा और तसल्ली होने के बाद ही उस पर काम किया। एक घटना है इसमें एक पुलिस थाने पर हमला करने की। तो इसे लेकर एक पुलिसवाले की सोच अलग होगी जबकि जिन गांव वालों ने ये सब देखा और इसके बाद जो भुगता, उनके लिए ये अलग अनुभव है। इसमें उन लोगों की बातें भी हैं जिनका पूरा जीवन सिर्फ एक अपराधी के उनके आसपास होने से हमेशा के लिए बदल गया। लेकिन, इसके बावजूद हमारा उद्देश्य किसी तरह की धारणा बनाना कभी नहीं रहा। हम अपनी तरफ से कुछ नहीं कह रहे। हम सिर्फ तथ्यों को दर्शकों के सामने परोस रहे हैं और बाकी सब कुछ दर्शकों के विवेक पर छोड़ रहे हैं।
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द हंट फॉर वीरप्पन
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
वीरप्पन की तलाश में लगे रहे पुलिस अफसरों सेबात करना तो फिर भी आसान रहा होगा लेकिन वीरप्पन की पत्नीमुथुलक्ष्मीको कैमरे पर लाना, ये कैसे संभव हुआ?
ये बहुत चुनौती भरा था क्योंकि उन्होंने ये कहानी इसके पहले किसी को बताई नहीं है। और, ये सारी बातें उनके दिल के बहुत करीब रही हैं। उन्हें ऐसे लोगों को तलाश थी जिन पर वह भरोसा कर सकें। और, कैमरे पर ये सब बताने में उन्हें भी समय लगा। हमें और हमारे निर्माताओं को तो खैर लगा ही। हमने उनके साथ बहुत सारा समय बिताया। उनको पूरा समय दिया। उनको तो बहुत सारे लोगों ने संपर्क किया होगा, लेकिन वह हमारे साथ ही बात करने को तैयार हुईं, इसके लिए हमें भी बहुत धीरज से काम लेना पड़ा। उनके साथ हमने चार दिन तक शूटिंग की। हम उन सारी जगहों पर गए जहां के बारे में वह अपने इंटरव्यू में बता रही हैं। उस जगह भी जहां वीरप्पन ने पहली बार उन्हें देखा था।
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ये सीरीज देखते समय मनमें कहीं मेरे ये भी चलता रहा कि कहीं ये फिल्म‘संजू’ की तरह वीरप्पनकी छवि बदलने की कोशिश तो नहीं?
आपको लगा ऐसा? लेकिन नहीं, हमारा ऐसा कोई इरादा नहीं था। मैं ऐसा कुछ करना भी नहीं चाहता। ‘द हंट फॉर वीरप्पन’ का कोई एजेंडा नहीं है। इसे बनाने के पीछे बस एक ही विचार रहा और वह था कि जो बात पता चली है, उसकी तह तक जाना और सच के जितना करीब जा सकें उतना करीब जाने की कोशिश करना।
डॉक्युसीरीज में आपने लिट्टे को तमिलनाडु के एकजमींदार के यहां ट्रेनिंग मिलने और वीरप्पन के श्रीलंका जाकर प्रभाकरण की शरण मेंरहने की भी बात कही है, इससे तो नया विवाद शुरू हो सकता है...
ये तो अच्छा है, सर। ‘द हंट फॉर वीरप्पन’ का विचार बस इतना है कि ये इस विषय पर एक अच्छी बहस करने का कारण बन सके। जिन सज्जन कोलाथुर मणि की आप बात कर रहे हैं वह तमिलनाडु के बहुत प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। और, जब आप उनके मुंह से वे सारी बातें सुनते हैं कि वीरप्पन क्या चाहता था तो यही वह बिंदु है जहां हम सच के जितना ज्यादा करीब हो सकते थे, जा सके।