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Hariprasad Chaurasia B'day: अनजान शख्स की बांसुरी ने बदली हरिप्रसाद की किस्मत, 13 की उम्र में ही किया कारनामा

Sat, 01 Jul 2023 10:14 AM IST
रुपाली रामा जायसवाल एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला

सार

हरिप्रसाद चौरसिया ने महज 13 की उम्र में बांसुरी से संगीत की ऐसी धुन छेड़ी कि हर कोई उनका दीवाना हो गया। आगे चलकर हरि के इस टैलेंट को देश से लेकर विदेश तक में सराहा गया। 
 
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पद्मविभूषण हरिप्रसाद चौरसिया - फोटो : सोशल मीडिया
संगीत में कुछ ऐसा जादू है, जिससे आप अपनी भावनाओं को जोड़ पाते हैं। मूड के हिसाब से आपको अलग-अलग गीत पसंद आते हैं। एक दौर ऐसा था, जब ज्यादातर गीत में बांसुरी के जरिए संगीत दिया जाता था। महज बांसुरी की धुन गाने को आत्मीयता से जोड़ देती थी। भले ही आज के समय में बांसुरी की धुन का इस्तेमाल कम हो गया है, लेकिन आज भी बांसुरी की धुन को तमाम लोगों के जरिए पसंद किया जाता है। यही कारण है कि पुराने गाने पर लोग आज भी झूमना पसंद करते हैं। साथ ही प्यार के हर पड़ाव पर इस संगीत से खुद को जुड़ा हुआ पाते हैं। आज बांसुरी की धुन को देश-दुनिया तक पहुंचाने वाले पद्मविभूषण हरिप्रसाद चौरसिया का 85वां जन्मदिन है। तो आइए इस बेहतरीन कलाकार और बांसुरी वादक के जन्मदिन पर इनके जीवन से जुड़े कुछ अहम और अनकहे पहलूओं पर प्रकाश डाल लेते हैं- 
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हरिप्रसाद चौरसिया - फोटो : सोशल मीडिया
हरिप्रसाद चौरसिया का जन्म एक जुलाई 1938 को प्रयागराज के भारती भवन पुस्तकालय के पास छेदीलाल चौरसिया के बेटे के रूप में हुआ था। हरि प्रसाद का परिवार चाहता था कि वह एक पहलवान बने। हालांकि, हरि का मन बचपन से ही संगीत में रमा हुआ था। हरिप्रसाद के बालसखा रामचंद्र पटेल ने बताया था कि हरि अपने मन और परिवार की इच्छा के बीच फंसे हुए थे और इसी उलझन में वह निर्णय नहीं ले पा रहे थे। हालांकि, हरि को उस मुकाम तक पहुंचना ही था, जहां उनकी किस्मत उन्हें ले जाना चाहती थी। हरि को एक दिन अचानक से उम्मीद की किरण दिखी, उन्होंने एक लड़के से बांसुरी मांगकर बजाई और उसकी धुन आज तक लोगों के कानों में गूंज रही है।
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हरिप्रसाद चौरसिया - फोटो : सोशल मीडिया
दरअसल, उस समय संगम की रेती पर माघ मेला लगा था। इसी दौरान एक अनाम लड़का बांसुरी खरीदकर भारती भवन पुस्तकालय के पास की गली से बजाते हुए निकला। 13 वर्षीय हरि ने उसे रोक लिया। हरि ने अनाम शख्स से बांसुरी मांगकर बजाई तो संगीत विद्यालय चलाने वाले पड़ोसी राजाराम धुन सुनकर चकित हो उठे। राजाराम ने हरि को बुलाकर संगीत का प्रशिक्षण दिया। वहीं, आज के दौर में हरिप्रसाद चौरसिया और बांसुरी एक दूसरे के पर्याय जैसे हैं। 

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हरिप्रसाद चौरसिया - फोटो : सोशल मीडिया
रामचंद्र के अनुसार, हरिप्रसाद की उम्र उस वक्त 13 या 14 वर्ष ही थी। राजाराम के संगीत विद्यालय में प्रशिक्षण लेने के बाद हरी की बांसुरी की धुन दूर-दूर तक अपना जादू चलाने लगी। हरि ने जीवन में आगे बढ़ते हुए कई और गुरुओं से बांसुरी की धुन को निखारने का हुनर सीखा, और फिर उन्हें इसके परिणामस्वरूप आकाशवाणी प्रयागराज में कार्यक्रम मिलने लगे। इतना ही नहीं बांसुरी में महारत हासिल करने के कारण लोग उन्हें सम्मानपूर्वक पंडित जी कहकर बुलाने लगे। 
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हरिप्रसाद चौरसिया - फोटो : सोशल मीडिया
आकाशवाणी कटक में नौकरी हरि प्रसाद के जीवन का टर्निंग पॉइंट बनी और मुंबई में बढ़ाया हुआ कदम उन्हें मंजिल तक लेकर पहुंचा। हरिप्रसाद ने बाद के दिनों में संतूर के सबसे बड़े कलाकार पंडित शिवकुमार शर्मा के साथ शिव हरि नाम से जोड़ी बनाकर 'सिलसिला', 'चांदनी', 'लम्हे' जैसी फिल्मों में संगीत दिया और फिल्म संगीत में नए शास्त्रीय प्रयोग किए।
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