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Hansal Mehta Interview: पूरा दिन शूटिंग के बाद अगले दिन धारावाहिक से निकाल दिया, हंसल का एक्सक्लूसिव खुलासा

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हंसल मेहता - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
तीन दशक से भी अधिक समय से कैमरे के पीछे सक्रिय निर्देशक हंसल मेहता की 11 साल पहले रिलीज फिल्म ‘शाहिद’ ने हिंदी सिनेमा में एक नया रास्ता बनाया। उसके बाद से हंसल की बनाई फिल्में मसलन ‘सिटीलाइट्स’, ‘सिमरन’, ‘ओमर्टा’, ‘छलांग’ और ‘फराज’ देश दुनिया में खूब सराही गईं। वेब सीरीज में भी ‘स्कैम’ और ‘स्कूप’ के जरिये हंसल ने कथा कथन के नए मापदंड बनाए हैं। और, अब उनकी नई वेब सीरीज ‘लुटेरे’ ने अपराध कथाओं को कहने का एक नया धरातल खोजा है। हंसल मेहता से ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल की एक एक्सक्लूसिव मुलाकात।
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हंसल मेहता - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

इतना लंबा समय निर्देशन में बिताने के बाद आपका अभिनय प्रक्रिया का क्या आंकलन है?

मेरा ये मानना है कि अभिनय की जो भी एक अभिनेता की प्रक्रिया है, वह कोशिश अगर अभिनय में दिखने लगे तो फिर वह अभिनय असफल है। एक अभिनेता कुछ भी तैयारी करे, कितनी भी तैयारी करे लेकिन वह परदे पर दिखना नहीं चाहिए। प्रक्रिया अभिनय को आसान बनाने के लिए होती है, एक किरदार को कैमरे के जरिये दर्शकों तक पहुंचाने के लिए।

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हंसल मेहता - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

बतौर अभिनेता तो आपने भी प्रयास किए हैं कैमरे के सामने?

हां, मैंने कई बार कोशिश की है अभिनेता बनने की। लेकिन, मुझे अगले दिन ही निकाल देते थे कि नहीं इनको आता नहीं है। अभिनय की कोशिशों ने मेरा जितना दिल तोड़ा है, उतना तो मेरी फ्लॉप फिल्मों ने भी नहीं तोड़ा। और, फिल्म से ज्यादा टेलीविजन धारावाहिकों ने मेरा दिल तोड़ा है। स्टार टीवी ने दिल तोड़ा है मेरा। पूरा दिन शूटिंग करने के बाद अगले दिन धारावाहिक से निकाल दिया। मुझे लगता था कि मैं खाना पका सकता हूं, चार बच्चों का बाप बन सकता हूं, निर्देशन कर सकता हूं तो अभिनय भी कर सकता हूं। लेकिन ये मेरा काम नहीं है। मैं बहुत बुरा अभिनेता हूं।
 

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अलीगढ़ - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

आपकी वेब सीरीज अधिकतर अपराध विषयों पर आधारित होती हैं, इसकी कोई खास वजह?

नहीं, फिल्मों में भी है। ‘अलीगढ़’ का जो विषय है, वह उस समय सेक्शन 377 के चलते अपराध ही था। शाहिद में जो था, वह भी एक तरह का सामाजिक अपराध ही था। मेरा मानना है कि कहानी के विषय की बजाय उसके किरदार उस विषय को रोचक बनाते हैं। हर किरदार आम ही होता है, लेकिन कोई बात होती है उसके जीवन में, कोई ऐसा उत्प्रेरक आता है उसके जीवन में जिसकी वजह से वह दूसरों से भिन्न काम करने लगता है और जिसकी वजह से वह कुछ और बन जाता है।

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हंसल मेहता-जय मेहता - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

आपको अपनी सारी वेब सीरीज के लिए पुरस्कार मिले और अब बारी बेटे की है, बेटे का नाम परदे पर बतौर निर्देशक देखना कैसा एहसास रहा?

मैं सिर्फ ये कह सकता हूं कि मुझ पर, जय पर, हमारे माता पिता का आशीर्वाद है। उन्होंने जो सपना देखा, वह आज पूरा हो रहा है। मुझे से ज्यादा उन्हें जय का नाम परदे पर देखने की ख्वाहिश थी। लेकिन, इसे देखे बिना ही वह इस दुनिया से चले गए। मुझे लगता कि कहीं न कहीं वह मुस्कुरा भी रहे होंगे। कहीं से तो देख पा रहे होंगे कि उनका जो लाडला है उसका नाम परदे पर निर्देशक के तौर पर आ रहा है। 15 साल की उम्र तक उनके साथ सोता था जय। ये हम सबके लिए पूरे परिवार के लिए एक बहुत भावुक क्षण है।
 

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फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया-शाहिद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

आपकी कई फिल्में ऐसी रही हैं जिन्हें दर्शक मानते हैं कि ऑस्कर पुरस्कारों में भारत का प्रतिनिधित्व करना चाहिए था, आपका क्या कहना है?

मुझे नहीं पता कि ऑस्कर के लिए भारत से फिल्में कैसे भेजी जाती हैं। कैसे चुनी जाती हैं, ये भी मुझे नहीं पता। फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया नामक एक संस्था है जो सिर्फ ऑस्कर पुरस्कारों से ठीक पहले चर्चा में आती है। बाकी पूरा साल ये क्या करती है, किसी को नहीं पता। अपनी फिल्म ऑस्कर में भेजने के लिए इनके पास फिल्म भेजनी होती है और इसके लिए वह 50 हजार रुपये प्रवेश शुल्क लेते हैं, क्यों? मुझे समझ नहीं आता। ‘शाहिद’ की एंट्री जमा करने के लिए मेरे पास इतने पैसे ही नहीं थे। मेरा मानना है कि वैध तरीके से जीती किसी फिल्म को भारत की तरफ से ऑस्कर में जाना चाहिए। कुछ नहीं तो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में चुनी गई सर्वश्रेष्ठ फिल्म को ही भेज दीजिए। ऑस्कर के लिए जो संस्था फिल्म का चयन करती है, उसका फिल्में बनाने की रचनात्मक प्रक्रिया से कोई लेना देना ही नहीं है।

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हंसल मेहता - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

और, अब इतने साल बाद कितना आसान हो चला है आपके लिए फिल्में या वेब सीरीज बनाना?

जब सब कुछ आसानी से होने लगता है तो तो मुझे डर लगने लगता है। सब कुछ बहुत आसान हो रहा हो तो मुझे डर लगता है कि ये अच्छा नहीं बन रहा है। कुछ तो तनाव होना चाहिए या बनाना चाहिए। मेरा मानना है कि आरामतलबी बहुत खतरनाक चीज है रचनात्मक कार्यों के लिए।

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लुटेरे - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

वेब सीरीज ‘लुटेरे’ का धरातल हिंदी वेब सीरीज के दर्शकों के लिए बिल्कुल नया है, ये विषय जब आपके पास आया तो आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी?

इसका विषय विशाल कपूर, शैलेश आर सिंह और सुपर्ण वर्मा ने लिखा था। मुझे और जय मेहता को इसके लिए तब बुलाया गया जब इसके पहले से तय निर्देशक वासन बाला अपनी फिल्म ‘मोनिका ओ माय डार्लिंग’ में व्यस्त हो गए। मैं उस वक्त ‘स्कूप’ कर रहा था। मैंने कहा कि जय को पसंद आया तो ही ये सीरीज करेंगे। जय ने इसे पढ़ा और उसे ये बहुत पसंद आया। नया था। मुझे इसमें अच्छा लगा ये था कि एक नई दुनिया को जानने की कोशिश थी। बहुत सारी घटनाओं से प्रेरित है लेकिन है ये काल्पनिक।
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