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Gulabo Sitabo Review: 'अक्टूबर' से गिरे तो जून में अटके शूजित सरकार, मिर्जा ने मिटा दी अमिताभ की आभा

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गुलाबो सिताबो फिल्म रिव्यू - फोटो : अमर उजाला

Movie Review: गुलाबो सिताबो
कलाकार: अमिताभ बच्चन, आयुष्मान खुराना, विजय राज, ब्रजेन्द्र काला, फार्रूख जफर, सृष्टि श्रीवास्तव आदि।
निर्देशक: शूजित सरकार
ओटीटी: प्राइम वीडियो
रेटिंग: *1/2


हिंदी सिनेमा में अमिताभ बच्चन का नाम तमाम निर्देशकों को उनके करियर की शीर्ष ऊंचाई तक ले जाने और फिर उनका करियर खतरे में भी डाल देने वाली फिल्मों के लिए चर्चित रहा है। गलती इसमें अमिताभ बच्चन की कम है। वह अब भी अपने हर किरदार में अपनी तरफ से जान डालने की पूरी कोशिश करते हैं, लेकिन किसे पता होता है कि अमिताभ बच्चन को लेकर जंजीर बनाने वाले प्रकाश मेहरा कभी उनको लेकर जादूगर भी बनाएंगे। और, किसे पता होता है कि अमिताभ बच्चन को लेकर पीकू बनाने वाले शूजित सरकार कभी उनको लेकर गुलाबो सिताबो भी बनाएंगे।

अमिताभ बच्चन एक कलाकार का नाम नहीं है। ये एक जीवित किवदंती का नाम है। उनके नाम जैसी ही उनकी आभा है। और, इस आभा के अनुरूप अगर फिल्म नहीं है, तो वह फिल्म कम से कम हिंदी पट्टी के दर्शकों को पसंद नहीं आने वाली। बाबूपट्टी के बच्चन को पैसे पैसे के लिए लाचार बुजुर्ग इंसान के रूप में कोई नहीं देखना चाहता। कोई नहीं देखना चाहता कि पुराने लखनऊ में आटा की चक्की चलाने वाला कोई बांके आकर उनसे अबे तबे में बात करे। और, कोई ये भी नहीं देखना चाहता कि अमिताभ बच्चन की हीरोइन किसी और के साथ भाग जाए। 78 के होने वाले हैं तो क्या? हीरोइन तो हीरोइन ही होती है ना, भले 15 साल बड़ी सही। शूबाइट के चक्कर में अमिताभ बच्चन से पहली बार मिलने वाले शूजित सरकार को अमिताभ का तिलिस्म समझने के लिए थोड़ा देश भ्रमण और करना चाहिए।

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गुलाबो सिताबो - फोटो : Amar Ujala, Mumbai

शूजित सरकार इस फिल्म की रिलीज से पहले इसी बात पर इतराते रहे कि अमिताभ बच्चन को फिल्म के मिर्जा वाले गेटअप में पुराने लखनऊ के लोग पहचान ही नहीं पाए। अच्छी बात है, लोगों ने नहीं पहचाना होगा, लेकिन फिर अमिताभ बच्चन की जरूरत ही क्या ऐसे रोल में जिसमें अमिताभ बच्चन को पहचाना ही नहीं जाना है। मिर्जा का किरदार ही उनका इतना कमजोर है कि पहचानने की जरूरत महसूस नहीं होती। नाक बदल देना, विग की जगह जालीदार टोपी पहना देना, पीठ पर लगी चेन वाला ढीला ढाला कुर्ता पहना देना और कमर झुकाकर चला देना, निर्देशन नहीं है। निर्देशन है ‘पा’ जैसे किरदार में शक्ल सूरत बदल देने के बाद भी अमिताभ बच्चन की अमिट आभा बनाए रखना।
 

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गुलाबो सिताबो - फोटो : Amar Ujala, Mumbai

गुलाबो सिताबो उत्तर प्रदेश की दशकों पुरानी लोककला है। कलंदर लोग दास्तानों की तरह दो कठपुतलियां हाथों में पहनते हैं और उन्हें लड़ाते रहते हैं। नई जेनरेशन को समझाने के लिए शूजित ने टॉम एंड जेरी का एक सीन भी टीवी पर दिखा दिया। भैया, अगर आपको अपनी कहानी का मर्म समझाने के लिए बिंबों या प्रतीकों की बजाय सीधे सीधे वस्तुओं पर ही आना है तो फिर कहानी क्या करेगी? गुलाबो सिताबो की कहानी को लेकर जूही चतुर्वेदी का दावा है कि ये उन्हीं की है। अब रहेगी भी उन्हीं की ही।
 

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गुलाबो सिताबो - फोटो : Amar Ujala, Mumbai

अमिताभ बच्चन को फिर एक बार क्लास टीचर गलत मिला है। काम हालांकि तब भी उन्होंने क्लास में अव्वल आने वाला ही किया है। एक खास तरह से कमर झुकाकर चलने की उनकी मेहनत, 77 साल की उम्र में एक पुरानी हवेली के कोने कोने में अपने अभिनय की चमक दिखाने की हिम्मत हर उम्र और तबके के दर्शक को राहत देती है। कहानी फिल्म गुलाबो सिताबो की उन्हीं के इर्द गिर्द है। आयुष्मान भी फिल्म में हैं, ये आपको खुद याद रखना होता है। नहीं तो क्या विनोद खन्ना और क्या रजनीकांत, क्या कमल हासन और क्या शत्रुघ्न सिन्हा, क्या शशि कपूर और क्या मिथुन चक्रवर्ती और यहां तक कि गोविंदा तक सब उनके साथ एक फ्रेम में आकर अपनी आभा धूमिल कर बैठे। आयुष्मान को तो गोविंदा वाली शोहरत पाने में भी अभी थोड़ा वक़्त बाकी है।
 

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गुलाबो सिताबो - फोटो : Amar Ujala, Mumbai

15 भाषाओं वाले सबटाइटल के साथ प्राइम वीडियो पर रिलीज हो रही हिंदी सिनेमा की पहली मेनस्ट्रीम फिल्म ऐसी होगी, किसने सोचा होगा? ये फिल्म दो सौ देशों में दिखेगी और इन दो सौ देशों के लोग यही समझेंगे कि ये 2020 का बेस्ट हिंदी सिनेमा है। लेकिन, अफसोस कि ये सिनेमा बेस्ट तो क्या, बेटर या गुड भी नहीं है। ये इसके बावजूद कि अविक मुखोपाध्याय ने कैमरा बहुत बढ़िया हैंडल किया है। चंद्रशेखर प्रजापति ने एडीटिंग के टाइम शूजित को साथ न बिठाया होता तो शायद टाइमलाइन से तमाम कंटेंट और वह उड़ा सकते थे और फिल्म की स्पीड बढ़ा सकते थे। कलर पैलेट बढ़िया है पर लखनऊ रात में इससे कहीं ज्यादा सुंदर दिखता है।

 

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गुलाबो सिताबो - फोटो : Amar Ujala, Mumbai
लखनऊ की कहानी का बैकग्राउंड म्यूजिक जब डायरेक्टर बाउल संगीत से बनाए तो समझ लेना चाहिए कि आगे क्या होने वाला है। एक लाइन की कहानी फिल्म की ये है कि फातिमा मंजिल नाम की एक पुरानी हवेली में रहने वाले किराएदार बांके की खुद को मकान मालिक समझने वाले मिर्जा से पटती नहीं है। दोनों एक दूसरे को दरबदर करने की कोशिश में लगे रहते हैं। फिल्म के आखिर में समझना मुश्किल होता है कि इसमें कौन हारा, कौन जीता। विजय राज, ब्रजेन्द्र काला, सृष्टि श्रीवास्तव और फार्रूख जफर तक ने खूब मेहनत की लेकिन तमाशा जमा नहीं।

गुलाबो खूब लड़ैं, सिताबो खूब लड़ैं। लेकिन भैया शूजित सरकार अक्टूबर बनाने के बाद कम से कम नवंबर तो बनानी थी, ये तो सितंबर से भी पीछे जाकर अगस्त, जुलाई और जून में आकर अटकी है। एनीवेज, बेटर लक नेक्स्ट टाइम। हमारी तरफ से फिल्म गुलाबो सिताबो को डेढ़ स्टार।

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