गजराज राव, मनोज बायपेयी
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अंग्रेजी बोलने वाले बुरे नहीं होते
गजराज राव अक्सर फिल्मों में मध्यमवर्गीय परिवार के वर्जित विषयों पर बनी फिल्मों में दिखते हैं। बचपन भी उनका ऐसे ही परिवार में बीता और शुरू शुरू में तो खुद उनकी सोच भी वैसी ही थी। वह बताते हैं, ‘मुझे अपने ही मित्रों को घर लाने में बड़ा संकोच होता था। सोचता था कि मेरा छोटा सा घर और दोस्त मेरे सारे रईस परिवारों से। बाद में थियेटर ने जिंदगी के मेरे फलसफे को साफ किया। मैंने साहित्य पढ़ा। अच्छे लेखकों को पढ़ा और समझ ये आया कि दिमाग के जो जाले हैं, वे फालतू के हैं। ये भी समझ आया कि अंग्रेजी बोलने वाले और बड़े बंगलों में रहने वाले सारे लोग बुरे नहीं होते। एक तरह से रंगमंच की दुनिया में मेरा पुनर्जन्म ही हुआ। इसी दौरान अखबारों में लिखने का मौका मिला। पहले लेख के ढाई सौ रुपये मिले तो पिताजी को लगा कि अब लड़का कुछ कर ले जाएगा।’