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Sohrab Modi: सिनेमा का मोदी बना बॉलीवुड का पहला शो मैन, इन आठ फिल्मों ने पढ़ाया फिल्ममेकिंग का पाठ

Thu, 28 Jan 2021 02:13 PM IST
विजयाश्री गौर अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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सोहराब मोदी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
एक तो हैं हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिनका गुणगान इस समय आधी दुनिया कर रही है और एक सिनेमा में रहे सोहराब मोदी, जिनके काम की तारीफ किए बिना तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू भी न रह सके। बचपन से ही कला के शौकीन रहे सोहराब ने बड़े होकर बेहतरीन फिल्में बनाकर सिर्फ अपना शौक पूरा किया और आज उनके शौक को लोग करियर बनाकर आगे बढ़ते हैं। आजकल के सिनेमा में संजय लीला भंसाली और आशुतोष गोवारिकर जो बड़े बड़े सेट बनाकर फिल्में बनाते हैं, ये काम सोहराब ने 30, 40 और 50 के दशक में ही कर रखा है। चलिए, सोहराब मोदी की स्मृति दिवस पर आज हम उनकी कालजयी फिल्मों को याद करते हैं।
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मीठा जहर - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
मीठा जहर (1938)

सोहराब मोदी स्कूल की पढ़ाई के बाद ग्वालियर में अपने भाई केकी मोदी के साथ ट्रैवलिंग गाइड बन गए। जब वह 26 साल के हुए तो उन्होंने आर्या सुबोध थिएट्रिकल कंपनी की शुरुआत की। रंगमंच का पर्दा गिरते ही जनता खूब तालियां बजाती लेकिन वह नाटक मूक थे। 1931 में बोलती फिल्में आने लगीं तो थिएटर जाने वालों में कमी आ गई लेकिन सोहराब ने अपनी कला को मरने नहीं दिया और उन्होंने वर्ष 1935 में स्टेज फिल्म कंपनी शुरू कर दी। इसके तहत उन्होंने 'खून का खून' और 'सईद ए हवस' शीर्षक वाली दो फिल्में बनाईं। फिल्में फ्लॉप रहीं लेकिन सोहराब को जनता की पसंद का पता चल गया। 1936 में मिनर्वा मूवीटोन फिल्म कंपनी शुरू करके सोहराब ने सबसे पहले फिल्म बनाई 'मीठा जहर' इस फिल्म ने नशेबाजी का एक सामाजिक मुद्दा उठाया। सोहराब ने इस फिल्म का निर्देशन किया और फिल्म में नसीम बानो और गजानन जागीरदार के साथ अभिनय भी किया। यह फिल्म लोगों को बहुत पसंद आई। बस, यहीं से चल पड़ा सोहराब मोदी का कारवां।
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पुकार - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
पुकार (1939) 

सोहराब मोदी ने 1939 में मुगल बादशाह जहांगीर की न्यायप्रियता की एक घटना पर आधारित फिल्म 'पुकार' का निर्माण किया। यह फिल्म काल्पनिक ही थी लेकिन फिल्म के ज्यादातर दृश्य सोहराब ने मुगलों की बनाई हुई वास्तविक जगहों पर ही फिल्माए। इससे फिल्म में काफी वास्तविकता आई जो वह किसी स्टूडियो में फिल्माकर नहीं ला सकते थे। फिल्म की कहानी मशहूर फिल्मकार कमाल अमरोही ने लिखी और इसमें सोहराब के साथ चंद्र मोहन और नसीम बानो ने अभिनय किया। फिल्म की वास्तविकता दर्शकों को बहुत पसंद आई और फिल्म ने कमाल कर दिया।

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सिकंदर - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
सिकंदर (1941) 

अपनी फिल्म निर्माता कंपनी मिनर्वा मूवीटोन के बैनर तले लगातार सोहराब ने भव्य फिल्मों का निर्माण किया। इसमें भव्यता भरी अगली फिल्म रही वर्ष 1941 की 'सिकंदर'। इस फिल्म में अलेक्जेंडर द ग्रेट की भूमिका अभिनेता पृथ्वीराज कपूर ने निभाई। इस फिल्म के लिए सोहराब ने बड़े-बड़े सेट बनाए। उन्होंने फिल्म में दिखाया कि सिकंदर ने फारस होते हुए काबुल घाटी तक को जीत लिया लेकिन जब उसकी सेना भारत की ओर बढ़ी तो पोरस ने वहीं उसका रास्ता रोक दिया। इस फिल्म में लड़ाई के दृश्य सोहराब ने हॉलीवुड फिल्मकारों की मदद से फिल्माए। फिल्म की तारीफ न सिर्फ देश में, बल्कि विदेशों में भी बहुत हुई। इस फिल्म के रिलीज का समय ऐसा था जब एक तरफ द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा था और दूसरी तरफ देश में गांधी जी आजादी की लड़ाई छेड़ने के लिए तैयार थे। ऐसे में सोहराब की इस फिल्म ने राष्ट्रभक्ति की भावना पैदा की।
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पृथ्वी वल्लभ - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
पृथ्वी वल्लभ (1943) 

सोहराब ने 'पुकार', 'सिकंदर' और 'पृथ्वी वल्लभ' फिल्मों की एक ट्रियोलॉजी बनाई जो ऐतिहासिक कहानियों पर आधारित रही। वर्ष 1943 में आई फिल्म 'पृथ्वी वल्लभ' की कहानी इसी नाम से लिखे गए उपन्यास पर आधारित रही जिसे केएम मुंशी ने लिखा। फिल्म में मुख्य रूप से सोहराब मोदी और दुर्गा खोटे के किरदारों के बीच टकराव को दिखाया। सोहराब ने इस फिल्म में मुंज का और दुर्गा खोटे ने मृणालवती का किरदार निभाया। मृणालवती एक घमंडी रानी है जो मुंज को सार्वजनिक रूप से नीचा दिखाने की कोशिश करती है लेकिन किन्हीं कारणों की वजह से वह उससे प्यार करने लगती है। सोहराब मोदी की यह फिल्म दर्शकों को बहुत पसंद आई।
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शीश महल - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
शीश महल (1950)

सोहराब मोदी को बड़े-बड़े सेट बनाकर फिल्मों का निर्माण करने के लिए जाना जाता था। जब उन्होंने वर्ष 1950 में अपनी फिल्म 'शीश महल' बनाई तो इसके लिए भी उन्होंने एक भव्य सेट का निर्माण किया। समीक्षकों ने सोहराब के इस काम की बहुत सराहना की। हालांकि, फिल्म कुछ खास पसंद नहीं आई। जब इस फिल्म की स्क्रीनिंग मुंबई के मिनर्वा थिएटर में रखी गई तब सोहराब ने देखा कि पहली ही कतार में एक व्यक्ति आंख बंद करके बैठा हुआ है। उन्हें दर्शकों से ऐसी प्रतिक्रिया की आशा नहीं थी। उन्होंने अपने लोगों से कहा कि सभी लोगों को उनके पैसे वापस कर दें सबको बाहर भी निकाल दें। सोहराब का आदेश पाकर उनके कर्मचारी गए लेकिन उतनी जल्दी वह वापस भी आ गए। उन्होंने सोहराब को बताया कि वह आदमी आंख बंद करके नहीं बैठा है, बल्कि वह दृष्टिहीन है। वह फिल्म देखने नहीं, बल्कि फिल्म की लाइनें सुनने के लिए आया है। तब सोहराब को थोड़ी तसल्ली हुई। फिर भी दर्शकों के लिए यह फिल्म काफी अच्छी साबित हुई। इस फिल्म में सोहराब के अलावा नसीम बानो, निगार सुलताना, प्राण, लीला मिश्रा जैसे कलाकारों ने मुख्य भूमिकाएं निभाईं।
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झांसी की रानी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
झांसी की रानी (1953) 

सोहराब ने नसीम बानो के साथ कई फिल्मों में काम किया इसलिए इन दोनों के बीच प्रेम का एक गहरा रिश्ता भी बना लेकिन वर्ष 1944 की फिल्म 'परख' में काम करने वाली एक युवा अभिनेत्री मेहताब से सोहराब को प्रेम हो गया। मेहताब सिर्फ 20 साल की थीं जबकि उस समय सोहराब 48 वर्ष के थे। इन दोनों ने शादी कर ली। जब 1953 में सोहराब ने अपनी फिल्म 'झांसी की रानी' बनाई तो इस फिल्म में झांसी की रानी का किरदार मेहताब ने ही निभाया। यह फिल्म देश की पहली टेक्निकलर फिल्म रही। सोहराब ने हॉलीवुड तकनीशियनों की मदद से अपनी इस रंगीन फिल्म को बनाया। उन्होंने खुद इस फिल्म में राजगुरु का किरदार निभाया। सब कुछ बेहतरीन होने के बावजूद यह फिल्म दर्शकों को आकर्षित करने में कामयाब नहीं हुई।

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मिर्जा गालिब - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
मिर्जा गालिब (1954)

एक बड़ी फिल्म फ्लॉप हो जाने के बाद भी सोहराब मोदी रुके नहीं और उन्होंने वर्ष 1954 में देश के महान कवि मिर्जा गालिब के जीवन पर एक फिल्म 'मिर्जा गालिब' बना डाली। इस फिल्म ने राष्ट्रपति की तरफ से सर्वश्रेष्ठ फिल्म का स्वर्ण पुरस्कार जीता। सोहराब ने फिल्म में सभी दृश्यों को बहुत खूबसूरती से उस वक्त में बैठाया जब देश में आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर का शासन चल रहा था। उन्होंने बादशाह के दरबार और उनके समय के कवियों को बेहतरीन तरीके से अपनी फिल्म में दिखाया। मिर्जा गालिब का किरदार फिल्म में भारत भूषण ने निभाया जबकि मिर्जा गालिब को एक वेश्या से प्रेम था जिसका किरदार फिल्म में अभिनेत्री सुरैया ने निभाया। फिल्म में सुरैया के काम की बहुत तारीफ हुई। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी जब यह फिल्म देखी तो उन्होंने इस फिल्म की तारीफ में कहा, 'तुमने मिर्जा गालिब की रूह को जिंदा कर दिया।'
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कुंदन - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
कुंदन (1955)

वर्ष 1955 में सोहराब ने अपनी कंपनी के बैनर तले फिल्म 'कुंदन' का निर्माण और निर्देशन किया जिसमें उन्होंने निम्मी, सुनील दत्त, उल्हास, प्राण, मुराद, ओम प्रकाश, बेबी नाज जैसे कलाकारों के साथ मुख्य भूमिका भी निभाई। यह फिल्म विक्टर ह्यूगो के 1862 में लिखे उपन्यास 'लेस मिसरेबल्स' पर आधारित रही। फिल्म में सोहराब ने गरीबी से जूझ रहे एक युवा इंसान की भूमिका निभाई है जो एक रोटी का टुकड़ा चुराने पर पुलिस के चंगुल में फंस जाता है। यह एक सामाजिक मुद्दा उठाने वाली ड्रामा फिल्म रही।
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