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भारतीय सिनेमा का राष्ट्रीय संग्रहालय: तीसरे एपिसोड में जानें फिल्म के चार हिस्सों के बारे में

Fri, 29 Nov 2019 08:03 PM IST
Avinash Pal अमित कुमार, अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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भारतीय सिनेमा का राष्ट्रीय संग्रहालय - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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भारतीय सिनेमा के राष्ट्रीय संग्रहालय के दो एपिसोड्स के बाद अब आगे बढ़ते हैं एपिसोड तीन में की ओर और आपको बताते हैं कि संग्रहालय की नई इमारत के पहले हिस्से में अखिल भारत में सिनेमा के प्रसारण का वर्णन मिलता है। यहां देश के उस दौर के सिनेमा के बारे में बताया गया है जब गाड़ियों के माध्यम से एक जगह से दूसरी जगह फिल्में पहुंचती थी। कैसे गांव गांव में बायोस्कोप बच्चों की पसंद बन गया, कैसे भारतीय सिनेमा मूक सिनेमा से गतिमान सिनेमा की तरफ बढ़ता चला गया। इस सफर में पथदर्शियों का साथ मिला। कैसे विक्टोरिया होटल में हुए पहले शो ने भारत में सिनेमा की नींव डाल दी। भारतीय सिनेमा जैसे जैसे आगे बढ़ता गया वैसे वैसे स्टूडियोज की स्थापना भी होती गई। 

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भारतीय सिनेमा का राष्ट्रीय संग्रहालय - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
इसके साथ ही तस्वीरों के माध्यम से शुरुआती नायिकाओं से लेकर शुरुआती नायकों तक का संपूर्ण विवरण देखने को मिलता है। संग्रहालय में आगे, नए राष्ट्र और उसके सिनेमा, सिनेमा संस्थान, फिल्म प्रमाण और भारत में फिल्म प्रमाणन का इतिहास दर्शाया गया है। भारतीय सिनेमा में एक के बाद एक कई नायक और नायिकाओं  का जन्म हुआ।  इसके साथ ही सिनेमा में राजनीति, कला, साहित्य, संस्कृति का जुड़ाव, निर्देशकों और नायकों का दौर, यादगार और एतिहासिक फिल्में, भारतीय फिल्म संगीत और देश और दुनिया में सम्मानित कलाकारों का पूरा ब्यौरा देखने को मिलता है। 
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भारतीय सिनेमा का राष्ट्रीय संग्रहालय - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
संग्रहालय की नई इमारत के दूसरे मंजिल पर फिल्म के प्री प्रोडक्शन से लेकर पोस्ट प्रोडक्शन और बॉक्स ऑफिस तक की जानकारी मिलती है। समझाया गया है कि कैसे फिल्म के चार हिस्से होते हैं जिनमें प्री प्रोडक्शन, प्रोडक्शन, पोस्ट प्रोडक्शन और डिस्ट्रीब्यूशन शामिल है। वहीं आगे बढ़ने पर 1890 से लेकर 2010 तक के कैमरों की जानकारी मिलती है। तस्वीरों से लेकर कुछ असल कैमरों के माध्यम से कैमरे के महत्व और उसके बदलते स्वरुप को भली भांती समझाने की कोशिश की गई है। 

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भारतीय सिनेमा का राष्ट्रीय संग्रहालय - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
किसी भी फिल्म, फोटो या फिर वीडियो में लाइट का बहुत महत्व होता है। फिल्म में प्रत्येक परिस्थिति के अनुसार अलग सीन होता है और प्रत्येक सीन में अलग तरह के लाइट की जरुरत होती है। संग्रहालय में पुराने जमाने की कुछ लाइट्स देखने को भी मिलती हैं। कहा जाता है कि इन्हीं तरह के बल्ब के कारण अशोक कुमार की आंख में दिक्कत शुरू हो गई थी जिसके बाद वह चश्मा लगाने लगे थे। 
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भारतीय सिनेमा का राष्ट्रीय संग्रहालय - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
इसके साथ ही दुनिया की पहली एनिमेटड फिल्म और पहली भारतीय एनिमेटड फिल्म का वर्णन भी संग्रहालय में मिलता है। आगे बढ़ते हुए हमें देखने को मिला कि कैसे कैसे एनिमेशन फिल्मों को विस्तार होता गया कैसे 3डी फिल्मों चलन में आई और कैसे कॉर्टून फिल्मों का उदय हुआ इन सभी का सफरनामा हमें संग्रहालय की दीवारों पर देखने को मिलता है। कैमरों के बाद रिकॉर्डिंग के इतिहास की जानकारी मिलती है। पुराने जमाने की मशीनों के जरिए यह समझाने की कोशिश की गई है कि गुजरे जमाने में फिल्मों में रिकॉर्डिं का काम बेहद ही मुश्किल और उलझनों से भरा हुआ था। बावजूद इसके दिग्गज फिल्मकारों ने एक से बढ़कर एक बेहतरीन फिल्मों का निर्माण किया।  
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भारतीय सिनेमा का राष्ट्रीय संग्रहालय - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आगे चलते हुए प्लेबैक तकनीक, साउंड मिक्सिंग एंड एडटिंग के स्वर्णिम और जुझारु इतिहास से एक एक कर सामने आते हैं। आसान तरीके से इसे समझाने के लिए पुरानी मशीनों से लेकर मॉडल्स और तस्वीरों का सहारा लिया गया है। संग्रहालय के एक हिस्से में भारतीय सिनेमा के मूक सिनेमा से लेकर आधुनिक सिनेमा के बदलाव को बेहद ही रोचक तरीके से समाझाया गया है।

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