धर्मेंद्र
उन्होंने आशीष की बौछार कर दी और मेरे उस विश्वास को पुख्ता कर दिया, जो मैं उनके व्यक्तित्व से जोड़कर कल्पना किया करता था। कुछ महीने बाद वह दिन भी आया जब अपने गुरु स्व. श्रीराम ताम्रकर के साथ मुंबई उनका इंटरव्यू करने गया। हम उस कमरे में बैठा दिए गए, जिसमें थोड़ी देर में वे आने वाले थे। अचानक एकदम खूबसूरत, स्मार्ट, बने-संवरे मुस्कुराते हुए धर्मेंद्र कमरे में आ गए। कह सकता हूं कि मेरी मुस्कुराहट, मेरी खुशी, मेरी पलकें, मेरी आंखें सब क्षण भर को स्थिर हो गईं। ताम्रकर जी और मैं, हम दोनों ने ही उनके पांव छुए।