आलोक पांडे
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कार्यक्रम का सबसे भावुक पल तब आया जब चर्चित अभिनेता आलोक पांडे ने अपनी पुस्तक ‘बिचौलिए शहर’ का एक अंश पढ़ा। ये पुस्तक आलोक ने अपने पिता की स्मृतियों को सहेजने के लिए लिखी है। आलोक ने पढ़ा, “जब मैं गांव से जाता था जैसे-जैसे ट्रेन गांव से दूर निकलती जाती थी, आप चुपके चुपके रोते थे आपने कभी सामने से नहीं दिखाया। पापा, सुनो ना पापा, भगवान से कुछ सेटिंग करके, एक उधर से वीडियो कॉल करवा लो ना प्लीज, पापा प्लीज। मुझे कभी-कभी बहुत गुस्सा आता है कि मैं आपको मुंबई पहले क्यों नहीं ले गया, आप हमेशा मजाक मजाक में बोलते थे, समंदर कब दिखाओगे और मैं हमेशा यह कह देता पापा बस जल्दी ही, अपना घर ले लूं। भले ही छोटा हो लेकिन इसकी बालकनी से समंदर दिखता हो और आपके हाथ में मेरे हाथों से बनाई हुई अदरक वाली स्ट्रांग चाय का बड़ा वाला गिलास हो, ना वो बालकनी आ पाई और ना आप। कहानी अधूरी रह गई पापा…।”