गुड्डी
- फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
3 साल में मिला पहला बड़ा ब्रेक
जया भादुड़ी ने फिल्म ‘गुड्डी’ जब की तब वह 23 साल की थीं, लेकिन परदे पर उन्हें देखकर इस बात पर कतई अविश्वास नहीं होता कि वह स्कूल जाने वाली लड़की नहीं हैं। पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट में जया ने जो गोल्ड मेडल जीता, ‘गुड्डी’ उसकी चलती फिरती ट्रॉफी है। गुड्डी ने तब उन सब भारतीय किशोरियों के अरमानों को परदे पर जिया जिनके सपनों का राजकुमार गांव, गली, मोहल्ले का कोई युवा न होकर रुपहले परदे के सितारे होने लगे थे। करीने से बनाई गईं दो चोटियां, चोटियों में गुंथे फीते, प्लेटवाली यूनीफॉर्म और आंखों में कसक फिल्म स्टार धर्मेंद्र की। गुड्डी की हर अदा, हर कोशिश उस जमाने की किशोरियों को अपनी सी लगी। ऋषिकेश मुखर्जी ने फिल्म के भीतर एक ऐसा फिल्मी संसार रच दिया था कि उसका एक कोना ‘मधुमती’ के गाने ‘आ जा रे...परदेसी’ से मिलता है तो दूसरा गुलजार के लिखे भजन ‘हमको मन की शक्ति देना, मन विजय करें..’ से। कहानी भी मन को जीतने की ही है। कैसे एक किशोरी फिल्म स्टार धर्मेंद्र के लिए दीवानी है। उसे फिल्मी दुनिया सपनों की सतरंगी दुनिया सी लगती है, लेकिन फिर उसका हकीकत से उसका सामना भी होता है।