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Apna Adda 21: मुकद्दरपुर रैदास के अरुण का टोरंटो तक बजा डंका, लखीमपुर खीरी से निकला संभावनाशील निर्देशक

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अरुण मित्र - फोटो : अमर उजाला
‘अपना अड्डा’ सीरीज में इस बार कहानी लखीमपुर खीरी जिले के गांव मुकद्दरपुर रैदास में जन्मे अरुण कुमार मित्र उर्फ अरॉन मित्र की। अरुण धीरे धीरे निर्देशन में पैर जमा रहे हैं। मुंबई आने के बाद किया उन्होंने वो सब कुछ जिससे दो वक्त की रोटी मिल सके। अरुण की शॉर्ट फिल्म ‘गूलर के फूल’ को टोरंटो में होने वाले दक्षिण एशियाई फिल्म समारोह में शामिल किया गया है। 
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अरुण मित्र - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आप अपनी फिल्मों में अपना नाम अरॉन मित्र क्यों लिखते हैं, इसकी कोई खास वजह?
ये बदलाव किया तो मैंने अपने एक मित्र के कहने पर ही था, लेकिन इसके बाद से चीजें ठीक होती गईं तो मुझे लगा कि यही नाम रख लेना चाहिए। मेरे पिता उत्तर प्रदेश में बेसिक शिक्षा परिषद के स्कूल में अध्यापक थे। अपने नाम सूबेदार के साथ उन्होंने ही सरनेम मित्र लगाना शुरू किया।
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अरुण मित्र - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आपकी शॉर्ट फिल्म ‘अच्छे दिन’ को मामी फिल्म फेस्टिवल में पहला उपविजेता पुरस्कार मिला था तो उसके बाद आपके ‘अच्छे दिन’ आए क्या?
उस प्रतियोगिता का पहला उपविजेता (फर्स्ट रनरअप) पुरस्कार मिलने से बहुत लाभ हुआ। विधु विनोद चोपड़ा, राजकुमार हिरानी, अभिजात जोशी जैसे दिग्गजों के साथ काम सीखने का मौका मिला। एक फाइवडी मार्क थ्री कैमरा भी इनाम में मिला था। फिल्म के इसके बाद देश-विदेश में तमाम प्रदर्शन हुए और मुझे भी एक पहचान मिली।

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अरुण मित्र - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, अब ‘गूलर के फूल’। विकसित भारत की तरफ बढ़ रहे देश में किसानों की समस्याओं की तरफ आपका ध्यान कैसे गया?
मेरे ससुरजी अपनी धान की फसल बेचने थोक बाजार गए तो वहां उनका अनाज खरीदा गी नहीं गया। दो दिन तक भूखे प्यासे वहीं रुकने के बाद वह वापस गांव लौटे और स्थानीय ठेकेदारों को ही उन्हें अपनी फसल बेचनी पड़ी। न्यूनतम समर्थन मूल्य न मिल पाने की किसानों की इसी कसक ने मुझे ये फिल्म बनाने के लिए प्रेरित किया।
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संजय मिश्रा के साथ अरुण मित्र - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
‘गूलर के फूल’ में संजय मिश्रा के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?
कलाकार उनके जैसे हों तो फिर सिनेमा बनाने का आनंद ही कुछ और होता है। वह सेट पर आते हैं तो फिर सिनेमा के हो जाते हैं। न किसी खास तरह की कोई फरमाइश और न ही किसी तरह के नखरे। सिनेमा में उनका जितना बड़ा नाम है, वह उतने ही सरल, सहज और सादगी भरे इंसान हैं। वह हर नए निर्देशक की बात को गंभीरता से सुनते हैं और उसे पूर्णता देने की कोशिश करते हैं। अभिनेता अशोक पाठक भी उनके साथ हैं और उनकी मदद के बिना ये फिल्म पूरी नहीं हो पाती।
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अरुण मित्र - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
सुना है इन दिनों किसी क्राइम सीरीज पर काम कर रहे हैं आप?
हां, आपसे तो क्या ही कुछ छिपा है। ‘अमर उजाला’ को ही पहली बार बता रहा हूं कि ये सीरीज उत्तराखंड की पृष्ठभूमि पर है और इसका नाम है ‘पिथौरागढ़’। ज्यादा कुछ अभी बताना ठीक नहीं रहेगा। ये सीरीज मैंने भारतीय सेना के पूर्व कमांडो लकी बिष्ट के साथ मिलकर लिखी है।
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अरुण मित्र - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
विधु विनोद चोपड़ा और राजकुमार हिरानी के साथ काम करने का अनुभव क्या रहा? ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ में आपका योगदान क्या है? 
मामी फिल्म फेस्टिवल में मेरी फिल्म ‘अच्छे दिन’ को जब फर्स्ट रनर अप का पुरस्कार मिला तो इसके इनाम में मुझे विधु विनोद चोपड़ा फिल्म्स में काम करने का मौका मिला। वहीं, इस दौरान मैंने शैलीधर चोपड़ा के साथ भी बतौर सहायक उनकी फिल्म में काम किया। इस फिल्म में मुझे मेरे काम का क्रेडिट नहीं मिला, लेकिन मैं उसकी वजहों में नहीं जाना चाहता, उसकी एक अलग कहानी है।

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सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ के साथ अरुण मित्र - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

अच्छा, निर्देशक बनने से पहले आपने अभिनय भी खूब किया है, अपनी अभिनय यात्रा के रंग तो गिनाइए?

मैंने साल 2005 में लखनऊ में रंगमंच पर खूब काम किया। मेरा पहला नाटक ‘एक बयान’ था, जिसका लेखन और निर्देशन जितेंद्र मित्तल ने किया। इसमें मेरी नकारात्मक भूमिका थी। लखनऊ में ही मैंने राज बिसारिया, सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ और ललित सिंह पोखरिया सानिध्य में अभिनय की काफी कुछ बारीकियां सीखीं। लखनऊ की ही भारतेन्दु नाट्य अकादमी से मैंने अभिनय में दो साल का डिप्लोमा किया। 

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अरुण मित्र - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

और, मुंबई आने की तारीख याद है? उस पहले दिन की यादें?

जब मैं नवंबर 2010 में मुंबई पहुंचा तो दादर स्टेशन पर मेरे भारतेंदु नाट्य अकादमी के साथी नलनीश नील मुझे लेने आए थे। उसी दिन लोकल ट्रेन में सफर करने का अनुभव भी काफी दिलचस्प रहा। मुंबई पहुंचने के बाद पड़ोसी जिले शाहजहांपुर से आए अभिनेता राजपाल यादव से मिला। वह कमाल के इंसान हैं। खूब अच्छे से मिले। खूब डटकर भोजन कराया। अभिनय भी मैंने खूब किया। ‘सीआईडी, ‘सावधान इंडिया’ के अलावा फिल्में भी कीं। ‘मॉनसून शूटआउट’ में काम किया। ऋतिक रोशन वाली ‘अग्निपथ’ में था लेकिन इस फिल्म में मेरा किरदार एडिट में लापता सा हो गया।
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