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EXCLUSIVE मुलाकात में अनिल कपूर का खुलासा, इसलिए फिल्म ‘मशाल’ के सेट पर हुई दिलीप कुमार से टेंशन

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पंकज शुक्ल, अनिल कपूर - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अभिनेता अनिल कपूर को पहली नजर देखने से लगता ही नहीं कि 40 साल से तो ये अभिनय कर रहे हैं। 64 साल के हो चुके अनिल की जिंदगी का फलसफा है हर हाल में खुश रहना और मुसीबतें आएं भी तो उनका डटकर मुकाबला करना। अपनी नई फिल्म ‘एके वर्सेज एके’ में खूब तारीफें बटोर रहे अनिल अपने भीतर हिंदी सिनेमा के एक बड़े कालखंड का इतिहास संजोए हैं। ‘अमर उजाला’ के लिए उनसे ये खास बातचीत की सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने।
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एके वर्सेस एके - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
आप दो पीढ़ियों के हीरो हैं। हमने ‘तेजाब’, ‘राम लखन’ जैसी फिल्में देखीं, आज की पीढ़ी ‘एके वर्सेज एके’ में आपको बतौर हीरो देख रही है, कितना कठिन किरदार रहा खुद को ही पर्दे पर पेश करना?
मेरी शुरू से और सबसे पहली खोज तो यही रहती है कि मुझे ऐसा किरदार मिले जो मैंने पहले किया न हो। जब मुझे पता चलता है कि ये किरदार मैंने कभी किया नहीं है या इस किस्म की कहानी या पटकथा पर पहले मैंने काम नहीं किया है तो मेरी दिलचस्पी ऐसी पिक्चर में तुरंत बढ़ जाती है। फिर मैं देखता हूं फिल्म का निर्देशक कौन है? क्या होता है कि कभी कभी बहुत किरदार आते हैं। अलग तरह की पटकथाएं भी आती हैं। लेकिन, उन्हें लेकर आए निर्देशक पर मुझे भरोसा नहीं होता। तो मैं वे फिल्में नहीं करता। ऐसा भी हुआ है कि मेरे पास फिल्मों की बेहतरीन पटकथाएं आईं, लेकिन वे फिल्में सेट पर जाकर खराब हो गईं।
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एके वर्सेस एके - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
यानी कि जैसी कहानी सुनाई गई वैसी फिल्म बन नहीं पाई..
सिनेमा निर्देशक का माध्यम है। फर्ज कीजिए कि मेरे पास बहुत बेहतरीन पटकथा आई। लेकिन वह निर्देशक इस पर फिल्म कैसे बनाता है। कैसे शूटिंग के दौरान दृश्यों को ओके करता है? क्या वह मुझे समझा पाता है और फिर शूटिंग के बाद कैसे वह सारे दृश्यों को जोड़कर फिल्म बनाता है। तो क्या होता है कि अभिनेता कितना भी अच्छा हो, काम कितना ही अच्छा हो लेकिन निर्देशक अच्छा न हो तो कभी भी पर्दे पर वह जादू आ नहीं सकेगा।

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कर्मा - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
और, आपको तो तमाम तमाम बड़े निर्देशकों का साथ मिला है। उन निर्देशकों ने अनिल कपूर को अक्सर एक आम इंसान के रूप में पर्दे पर पेश किया, इस बार चुनौती एक सुपरस्टार को सुपरस्टार के तौर पर पर्दे पर पेश करने की रही..
आपने बिल्कुल सही कहा। मेरे करियर में मुझे अच्छे लेखकों और अच्छे निर्देशकों का बहुत अच्छा साथ मिला। जावेद (अख्तर) साब ने मेरे लिए इतने अच्छे अच्छे किरदार लिखे। ‘मशाल’ हो, ‘मेरी जंग’ हो या ‘मिस्टर इंडिया’ को ले लें। लेकिन, यहां निर्देशक थे शेखर कपूर। अगर वह निर्देशक नहीं होते और लेखक वही होते तो भी उसमें उतना जादू नहीं होता। यश चोपड़ा ने ‘मशाल’ में जादू किया। ‘मेरी जंग’ में सुभाष घई ने यही किया। फिर, फिर अमरीश पुरी थे मेरे सामने। दिलीप साब थे, द ग्रेट युसूफ साब, ‘एके वर्सेज एके’ में अनुराग कश्यप हैं। तो आपका साथी कलाकार कौन है? कौन निर्देशित कर रहा है? ये सारी चीजें जब सही हो जाती हैं तो फिल्म में एक जादू आ जाता है।

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अनिल कपूर, दिलीप कुमार - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
जैसा कि ‘एके वर्सेज एके’ में जिक्र आता है तो क्या दिलीप कुमार ने वाकई आपका चेहरा पकड़कर अपनी तरफ किया था और कहा था, ‘मेरी आंखों में देख..’?
ये किस्सा काफी हद तक सच्चा है। ऐसा हुआ था और शायद वह भी मेरी परीक्षा ले रहे थे, ऐसा मुझे लगता है। जब ये हो रहा था तो सेट पर काफी टेंशन हो गई थी और शूटिंग रुक गई थी लेकिन मैं डटा रहा। उन्होंने यश जी से बात की और यश जी ने मुझसे बात की। यशजी ने मुझे कहा कि जब युसूफ साब आएं तो उनकी तरफ देखो। लेकिन मेरा तर्क था कि मैं देखूंगा लेकिन मैं इतनी जल्दी नहीं देखूंगा क्योंकि मेरा किरदार एक गुंडा आदमी का है। हालांकि, शूटिंग के बाद फिर बाहर हमारी बात हुई औऱ उनको मेरा काम इतना पसंद आया कि उन्होंने कम से कम 50 लोगों से मेरे बारे में बात की और मेरे नाम की सिफारिश की। मैं उनके साथ ‘शक्ति’, ‘कर्मा’ और ‘मशाल’ में साथ काम किया और मैं खुद को उन गिनती के भाग्यशाली अभिनेताओं में मानता हूं जिन्होंने महान दिलीप कुमार के साथ तीन बार काम किया।

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अनुराग कश्यप, अनिल कपूर - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
‘एके वर्सेज एके’ एक व्यंग्य है, जिसमें सब लोग अपने अतीत पर ही हंस रहे हैं..
ये बहुत जरूरी भी है कि लोगों को अपने आपको बहुत गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। मेरा मानना है कि जिंदगी बहुत छोटी है। जितना आप इसे सहजता से जिएंगे उतना ही स्वस्थ रहेंगे। लोग मुझसे मेरी तंदरुस्ती और मेरी चैतन्यता के बारे में पूछते हैं। मेरा यही जवाब रहता है कि मैं चीजों को बहुत हल्के तरीके से लेता हूं। मेरी पत्नी भी कभी कभी इसे लेकर नाराज होती हैं। वह मुझे बताती हैं कि ये मजाक की बात नहीं है। गंभीर मसला है। लेकिन, मैं फिर भी यही कहता हूं कि हां मैं इसका हल निकाल लूंगा, अभी परेशान होने की जरूरत नहीं है।

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राम लखन - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
आपके ऊपर ‘माई नेम इज लखन’  फिर से फिल्माया गया है, ये इकलौता गाना है हिंदी सिनेमा का जिसमें सिर्फ परकशन (ढोलक, तबला आदि) है, म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट (गिटार, सितार नहीं है, इसकी क्या यादे हैं?
ये सही है कि इसमें सिर्फ रिदम है और इसमें कोई दूसरा म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट प्रयोग नहीं हुआ है। यही लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जैसे जीनियस की कलाकारी है। मैं सौभाग्यशाली मानता हूं खुद को ऐसी तमाम रिकॉर्डिंग का मैं हिस्सा रहा हूं। फिल्म ‘राम लखन’ की इसी गाने से शुरू हुई थी और इसमें सिनेमैटोग्राफर अशोक मेहता ने भी अपनी कलाकारी दिखाई थी। बीआर डबिंग थिएटर में हम ये गाना देख रहे थे और लोगों को लग रहा था कि ये हीरो के चेहरे पर छाया क्यों है? उसी दिन हमें पता था कि ये गाना सुपर डुपर हिट होने वाला है। इतना ग्लैमरस होने के बाद भी इस गाने में एक वास्तविकता है, एक गहराई है। ये गाना मुझे मिला, मैं खुद को किस्मतवाला मानता हूं। दोबारा जब ये गाना मेरे ऊपर शूट होना था तो मैं फिर बहुत नर्वस था कि कहीं हम खराब न कर दें ये गाना। हमने उस दिन इस गाने को शूट करने के लिए आठ घंटे की शिफ्ट रखी थी लेकिन काम तीन घंटे में ही पूरा हो गया।

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राम लखन - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
और, इस गाने को गाने वाले मोहम्मद अजीज ने निधन से कुछ ही दिन पहले मेरे एक इंटरव्यू में कहा था कि दुनिया ने उन्हें भुला दिया, ऐसा क्यों होता है भला?
ये बात तो मैं भी समझना चाहता हूं कि ऐसा क्यों होता है भला? क्या शोहरत मिलने के बाद इंसान बदल जाता है, क्या उसके आस-पास के लोग बदल जाते हैं? ऐसे लोगों की लंबी फेहरिस्त है मेरे पास। लेकिन, मुझे भी समझ नहीं आता कि ऐसा क्यों होता है?

https://www.facebook.com/watch/?ref=external&v=2209049782462894
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ईश्वर - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
बस करते रहो, करते रहो, जो चाहते हो एक दिन मिल ही जाएगा
अनिल कपूर ने कैसे ये कामयाबी पाई? कैसे लगातार 40 साल से वह लोकप्रिय बने हुए हैं। बताते हैं निर्देशक विक्रमादित्य मोटवाने, “फिल्म ‘एके वर्सेज एके’ की पटकथा पूरी होने के बाद मैं अनिल जी के साथ चार पांच दिन बैठा और नोट्स बनाने लगा कि उनके जीवन में और क्या क्या दिलचस्प हुआ। हमने सोचा कि इसे हम फिल्म की कहानी में जोड़ लेंगे। उन्होंने अपने बचपन से बताना शुरू किया। स्कूल कॉलेज के बारे में बताया। अपने घर परिवार के बारे में बताया। उनकी कहानी दरअसल संघर्षों से निकले एक सितारे की कहानी है। किसी भी बड़े कलाकार के जीवन में जो वास्तविक संघर्ष होता है, उस सबसे अनिल कपूर गुजरे हैं। लेकिन, सबसे बड़ी बात जो मैंने उनसे सीखी है, वह है धैर्य बनाए रखना। अपने पूरे संघर्ष के दौरान अनिल कपूर ने धैर्य बनाए रखा और अपना काम करते रहे। उनका उसूल मुझे अच्छा लगा कि बस करते रहो, करते रहो, जो चाहते हो एक दिन मिल ही जाएगा। आप सोचेंगे तो समझ आएगा कि आखिर ‘मिस्टर इंडिया’ और ‘राम लखन’ के बाद भी वह ‘ईश्वर’ और ‘लम्हे’ जैसी फिल्में करते रहे, ‘माई वाइव्स मर्डर’ की, अब ‘एके वर्सेज एके’ कर रहे हैं। सिनेमा के हर छात्र के लिए उनका पूरा जीवन किसी सबक से कम नहीं है।”

अनिल कपूर के इस इंटरव्यू का पूरा वीडियो आप यहां देख सकते हैं...

https://www.facebook.com/watch/live/?v=426312412072745&ref=watch_permalink



 
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