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Anand Raj Anand Interview: ‘ये जो तेरी पायलों की छनछन है’ ने बदली किस्मत, गोविंदा के लिए बनाया ये कालजयी गाना

Mon, 21 Aug 2023 09:57 AM IST
निधि पाल अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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आनंद राज आनंद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

संगीत की दुनिया के आनंद राज आनंद ऐसे सितारे हैं, जो अपनी फिल्मों के खुद ही गाने लिखते है फिर संगीत की रचना करते हैं। उन्होंने अपनी फिल्मों के कई गाने भी खुद ही गाए हैं।  दरअसल, आनंद राज आनंद मुंबई गायक बनने आए थे। लेकिन जिस दौर में वह गायक बनने आए उस दौर में उदित नारायण, कुमार सानू, अभिजीत और सोनू निगम जैसे गायकों का बोल बाला था। और, कोई भी म्यूजिक कंपनी उन्हे गायक के तौर पर लांच नहीं करना चाह रही थी । लेकिन आज भी आनंद राज आनंद का पहला प्यार उनका गायन ही है। आनंद राज आनंद ने ‘अमर उजाला’ से ये खास बातचीत की । 

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आनंद राज आनंद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

आप दिल्ली से  मुंबई गायक बनने का सपना लेकर आए थे फिर संगीतकार के रूप में आपकी शुरुआत कैसे हुई ? 

देखिए, मेरा पहला प्यार तो सिंगिंग है, इसलिए अपना एक म्यूजिक वीडियो 'तड़फ -द हिडन डिजायर' बना रहा हूं । मुझे गाने का बहुत शौक था, लेकिन जब इंडस्ट्री में आया। उस समय  उदित नारायण, कुमार सानू, अभिजीत और सोनू निगम जैसे गायकों का बोल बाला था। म्यूजिक कंपनी वालों मुझसे कहते थे कि जब तक पुराना दूधवाला  पानी नहीं मिलाएगा तो नए से लोग दूध कैसे लेंगे?  मुझे समझ में आ गया कि ऐसे मुझे गाने का मौका नहीं मिलेगा। फिर मैंने म्यूजिक डायरेक्शन में अपना करियर बनाया। और, अपने म्यूजिक डायरेक्शन में जो मेरा दिल करता था मैं गाता था। जैसे 'इश्क समंदर', 'माही वे', 'दिल दे दिया', 'बिल्लो रानी' जैसे बहुत सारे गाने गया, जो सभी हिट रहे। 

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आनंद राज आनंद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

किन गायकों का आपके ऊपर ज्यादा प्रभाव रहा

जब मैं दिल्ली में था तो उस समय गजलों का बहुत बड़ा दौर आया। पंकज उधास, अनूप जलोटा, जगजीत सिंह की गजलों का  बहुत ही जबर्दस्त दौर था। उस समय लोग फिल्मी म्यूजिक से थोड़ा हट गए थे। मैंने  पांच महीने में 40 -45 गजलें लिख डाली। आज भी वह गजले मेरे पास पड़ी हुई हैं। उस समय  मुझे ऐसा लगता था कि गजल गाने के लिए शाल पहनकर हारमोनियम पर बैठ जाते हैं, लेकिन यह इतना आसान नहीं होता है। जब मैं 1984 में सिविल इंजीनियरिंग कर रहा था। मैंने अपने पिता जी को बोला कि थोड़ा पैसे दो मुझे एक शो करना है। वहां से मेरी गजल गायकी की शुरुआत हुई। गजल का काम बहुत मुश्किल काम होता है। उसके मुकाबले फिल्मी संगीत बड़ा आसान होता है।

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आनंद राज आनंद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

गुरु किसे बनाया आपने?

मैंने  गुरु किसी को बनाया ही नहीं। लोग मुझसे पूछते हैं कि संगीत किससे सीखी। अगर मैं किसी से सीखा होता, तो मैं वही करता जो सीखा होता। मैंने किसी से सीखा नहीं, इसलिए कुछ भी करता हूं। कई बार ईश्वर अपने आप ही सीखा देता है। जब रेडियो पर गाना चलता था, तो उसे आधा सुनकर बंद कर देता था। और, सोचता था कि अगर यह गाना मुझे बनाना होता तो क्या बनता? मोहम्मद  रफी साहब, किशोर साहब के गाने सुनता था और सोचता था कि किस तरह से उन्होंने गाए हैं, किस तरह से गाने लिखे गए होंगे। इस तरह से देखा जाए तो मेरे गुरु मोहम्मद  रफी साहब, किशोर कुमार साहब हुए। सुनकर पढ़कर और यह समझकर की, अगर मुझे ऐसा करना हो तो कैसे करेंगे ? 

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आनंद राज आनंद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

संगीतकार के तौर पर आपको पहला मौका महेश कोठारे की फिल्म 'मासूम' में मिला, इस फिल्म से कैसे जुड़ना हुआ ? 

इस फिल्म में काम करना मेरे लिए बहुत बड़ा चलेंज था। इस फिल्म के लिए पांच - छह रोमांटिक गाने बनाकर मैं महेश कोठारे से मिला। एक फिल्म 'होम अलोन' आई थी। इसी फिल्म की रीमेक 'मासूम' थी और हिंदी सिनेमा में महेश कोठारे इस फिल्म से अपने करियर की शुरुआत कर रहे थे । इससे पहले वह मराठी में कई हिट फिल्में बना चुके थे। उनसे मिल तो उन्होंने बताया कि फिल्म का  हीरो एक जर्नलिस्ट है, हीरोइन गांव की लड़की है। रोमांटिक गाने तो उन पर फिल्मा दूंगा, लेकिन फिल्म में एक बच्चे का गाना चाहिए। अगर वह गाना बन गया तो ही फिल्म बनाएंगे।  यह मेरे लिए बहुत बड़ा चलेंज था कि लड़के का गाना बनाए कैसे? फिल्म में मौका तो मिल रहा था, लेकिन शर्त यह थी कि छोटे बच्चे पर गाना बन जाएगा तभी फिल्म बनेगी। 

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आनंद राज आनंद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

'छोटा बच्चा जान के हमको ना समझाना रे' की क्या कहानी है? 

मैने महेश कोठारे से पूछा कि बच्चा कैसा है, उससे आप क्या बुलवाना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि बच्चा ऐसा है, जो खुद को  बच्चा नहीं समझता है। यहां से मुझे एक लाइन मिल गई। वह लाइन एक बूंद की तरह टपकी थी। फिर इस गाने को पूरा लिखा, उसके बाद मेरे सामने समस्या थी कि गाने किससे गवाया जाए, जो एकदम बच्चे की आवाज में गा सके। उन दिनों मैं  उदित नारायण जी के घर पर आदित्य नारायण को  गाना सीखाने जाता था। मैंने सोचा कि आदित्य से ही गवाते हैं। इस गाने का आदित्य से घर पर खूब रियाज करवाया। उनकी मम्मी बार- बार आकार कहती थी कि बच्चे का गला इतना मत फड़वाइए, अभी यह बच्चा है। लेकिन, मैंने गाना इतना सिखा दिया था कि स्टूडियो में आधे घंटे में गाने रिकॉर्ड करके चला गया। वह गाना अपने आप में एक इतिहास बन गया। इस फिल्म के बाकी गाने 'ये जो तेरी पायलों की छनछन है', 'टुकुर टुकुर देखते हो क्या', भी खूब हिट हुए और फिल्म सिल्वर जुबली हो गई। उससे पहले तो किसी को मालूम ही नहीं था कि आनंद राज आनंद कौन हैं? अचानक टीवी पर एक नाम आया, देखकर बहुत खुश हुआ और खूब रोया भी। जुलाई का महीना था खूब बारिश हो रही थी। टाइम्स म्यूजिक से  फोन आया कि जुहू पर मेरा पोस्टर लगा हुआ है। पोस्टर पर लिखा था कि गीत और संगीत आनंद राज आनंद।

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आनंद राज आनंद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

अमिताभ बच्चन के होम प्रोडक्शन की फिल्म 'मेजर साहब' में पहले इलैयाराजा के बेटे कार्तिक राजा संगीत देने वाले थे । आप इस फिल्म से कैसे जुड़े और अमिताभ बच्चन के साथ कैसे अनुभव रहे ? 

हां, पहले इस फिल्म में इलैयाराजा के बेटे कार्तिक राजा संगीत देने वाले थे। इस फिल्म के संगीत के लिए बच्चन साहब कई लोगों से मिल रहे थे । मैंने भी फिल्म के निर्देशक टीनू आनंद को कुछ गाने सुनाए। उन्होंने कहा कि  मैं वादा नहीं कर सकता कि फिल्म में आपके गाने होंगे। लेकिन इतना वादा कर सकता हूं कि एक बार गाने अमिताभ बच्चन के सामने सुनवा जरूर दूंगा। बच्चन साहब को मैं गाने सुनाने गया तो एकदम से डर गया। बच्चन साहब गाने सुने, लेकिन  मेरे सामने तो उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। मैं बहुत डरा हुआ था कि पता नहीं क्या होगा? 12- 13 दिन के बाद टीनू जी का फोन आया कि तैयार हो जाओ। इस तरह से इस फिल्म से जुड़ना हुआ। 

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आनंद राज आनंद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

अमिताभ बच्चन का म्यूजिक में कितना इंवॉल्वमेंट रहा? 

'मेजर साहब' की रिकॉर्डिंग सनी स्टूडियो में होती थी। बच्चन साहब गाने सुनने आते थे, उनके सुनने के बाद ही गाना फाइनल होता था। उनका कुछ सुझाव होता था तो अपना सुझाव देते थे इसके बाद तुरंत उनके सामने ही जो करेक्शन होता था वह करते थे। एक बार ऐसा हुआ कि पूरे दिन भर रिकॉर्डिंग चलती रही, बच्चन साहब नहीं आए तो सभी म्यूजिशियन उनका इंतजार करते करते वही सो गए । अचानक सुबह- सुबह 7.30 पर बच्चन साहब आ गए। मैंने  रेकॉर्डिस्ट को  उठाया फिर बच्चन साहब ने गाना सुना। उसके बाद गाना फाईनल हुआ, हमने वैसे भी दिन देखे हैं । उस समय गानों को लेकर ऐसी दीवानगी होती थी कि एक्टर खुद म्यूजिक सीटिंग और रिकॉर्डिंग में आते थे । महबूब स्टूडियो में मैंने जब 'हद कर दी आपने' के गाने 'फिर तोते से बोली मैना क्या कहना रिकॉर्ड किए थे। तो इस गाने 70 म्यूजिशियन थे। बहुत अच्छा अनुभव रहा, मैं बड़ा खुशनसीब हूं कि कंप्यूटर वाला दौर तो अब देख रहा हूं, लेकिन मैने वो जो दौर देखा है, उसमे  मानवता का जो स्पर्श था, उसका जवाब नहीं था।

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आनंद राज आनंद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

'हद कर दी आपने' के बाद तो आपने गोविंदा के साथ कई फिल्में की। जब किसी स्टार के लिए संगीत की रचना करते हैं, तो उस स्टार की छवि को कितना ध्यान में रखना पड़ता है?

गोविंदा जी  के साथ मेरा अनुभव बाकी संगीतकारों जैसा नहीं रहा। गोविंदा जी मेरे पास सबसे पहले 'परदेसी बाबू' आई, तो उन्होंने मुझे एक जिम्मेदारी दे दी कि मनोज कुमार की फिल्म ' पूरब और पश्चिम ' का गीत 'जब जीरो दिया मेरे  भारत ने' जैसा देश भक्ति का गाना चाहिए। लेकिन गाना ऐसा हो, जिसमें  परफॉर्म कर सकूं। फिर मैंने गाना लिखा 'जहां पांव में पायल, हाथ में कंगन, हो माथे पे बिंदिया, इट्स हैपेन्स ओनली  इन इंडिया'  यह गाना गोविंदा जी  बहुत पसंद आया। फिल्म में इस गाने की गुंजाइश बिलकुल भी नहीं थी, लेकिन उन्होंने डायरेक्टर मनोज अग्रवाल को बोल दिया कि मुझे नहीं पता कि गाना कैसे और कहां गाना फिट बैठेगा, लेकिन यह गाना फिल्म में चाहिए। आज भी मुझे खुशी होती है कि जब यह गाना 15 अगस्त और 26 जनवरी को बजता है।

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