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ब्रिटिश फिल्मों में तेजी से उभर रहे हैं अली फजल, 'गुड्डू भैया' का किरदार रहा चर्चा में

Sat, 01 Dec 2018 10:21 AM IST
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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ali fazal
महारानी विक्टोरिया और उनके मुंशी अब्दुल करीम पर बनी ब्रिटिश फिल्म 'विक्टोरिया एंड अब्दुल' ने आपको काफी शोहरत दिलाई। अब्दुल के रोल और 1850 के दशक को समझने के लिए क्या तैयारी की थी? अब्दुल करीम आगरा के भले ही थे, लेकिन भारत का नक्शा तब काफी बदल चुका था। 1857 की क्रांति हो चुकी थी। रेलगाड़ी जैसी नई चीज देश में आ चुकी थी। लेकिन उसमें सफर सिर्फ अंग्रेज ही करते थे। आम भारतीय को तो पैदल, साइकिल, रिक्शा से ही यात्रा करनी होती थी। अदालतों का ज्यादातर कामकाज उर्दू में होता था। अब्दुल के सिर्फ तीन-चार ओरिजनल फोटो मिलते हैं। फिल्म साइन करके जब मैं लंदन गया तो एक महीने होटल में रहा। उस दौर को समझने के लिए इतिहास की 10-12 किताबें पढ़ीं। शरबानी बसु की किताब पढ़ी? जिस पर फिल्म आधारित थी।
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ali fazal
उस वक्त मैंने सबसे झूठ बोला कि पढ़ी है, लेकिन स्क्रिप्ट को खूब ध्यान से पढ़ा। उसमें काफी फैंटेसी थी। कहानी जटिल थी, क्योंकि महारानी और अब्दुल के बीच आध्यात्मिक-आत्मीय संबंध थे। प्रेम था, दोस्ती थी। अब्दुल महारानी से मिले थे, तो वह 67 साल की थीं और अब्दुल 30 के थे। 82 की उम्र में महारानी की मृत्यु हुई। फिल्म में अब्दुल के जीवन को अधिक नहीं दिखाया। इसकी वजह? फिल्ममेकर कहानी को विक्टोरिया और अब्दुल की रिलेशनशिप के बुलबुले तक सीमित रखना चाहते थे। वह फूटा तो उनके लिए कहानी खत्म हो गई। अब्दुल के लिए वह वक्त मुश्किलों भरा था। आगरा में उन्हें गद्दार की तरह देखा जा रहा था और ब्रिटेन में महारानी की वजह से लोग उनके दुश्मन बने थे। विक्टोरिया की मृत्यु के बाद अब्दुल आगरा में उनकी प्रतिमा के पास जाकर बैठते थे। वहीं 1909 में उनकी मौत हुई।
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Richa chadha and Ali fazal
'फुकरे' फ्रेंचाइजी फिल्म में आपका रोल बहुत उल्लेखनीय नहीं है। क्यों? मैं 'फुकरे' को टीम-एफर्ट मानता हूं। यह अनोखी फ्रेंचाइजी है, जिसके एक्टरों को लोग उनके किरदारों के नाम से जानते हैं। अगर पार्ट-3 बनता है, तो मैं उसमें जरूर रहना चाहूंगा। 'फुकरे' से 'विक्टोरिया एंड अब्दुल' तक आपके काम को उतनी पहचान नहीं मिली। ऐसा क्यों? बात सही है, लेकिन 2018 मेरे लिए अच्छा रहा। मैंने वेब सीरीज 'मिर्जापुर' की शूटिंग से इसकी शुरुआत की। फिर तिग्मांशु धूलिया की फिल्म 'मिलन टॉकीज' की। मैंने संजय दत्त प्रोडक्शन की 'प्रस्थानम' में काम किया। दोनों में लीड रोल है। 'प्रस्थानम' राजनीति के बैकड्रॉप में पिता-पुत्री की कहानी है। 

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अली फजल
मनीषा कोइराला मेरी मां के रोल में हैं। जैकी श्रॉफ भी हैं। हॉलीवुड में काफी काम कर रहे हैं, क्या बॉलीवुड में आपके साथ अन्याय हो रहा है? मुझे छलांग लगाने का मौका नहीं मिला। मैं कदम-कदम आगे बढ़ा हूं। कुछ फिल्में तो मैंने उत्साह में कर ली थीं। 'थ्री इडियट्स' मैंने सेकेंड ईयर कॉलेज में की थी। फिर मास्टर्स भी किया। एक्टिंग भी करता रहा। 'फुकरे' मिली तो सोचा कर लेते हैं। जब तिग्मांशु ने मुझे 'मिलन टॉकीज' के लिए फोन पर कहा कि फैंटम के ऑफिस के पास मेरा ऑफिस है, वहां आ जाना। मैंने कहा कि सर मुझे उनका ऑफिस नहीं मालूम, क्योंकि वहां से मुझे कॉल्स नहीं आते।
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अली फजल
ऐसा क्यों...? आर्ट फिल्म वाले मुझे नहीं बुलाते, क्योंकि मेरा लुक आर्ट वाला नहीं है। मुझे नहीं पता कि उनके लिए कैसा दिखना चाहिए। वहीं, कमर्शियल वालों के लिए मैं उतना कमर्शियल नहीं हूं। मैं इसी सोच-विचार के भेद में फंस गया हूं। प्रोड्यूसर सोचता है कि मैं इस पर क्यों पैसा लगाऊं। लेकिन अब धीरे-धीरे हॉलीवुड के बाद मुझे यहां भी पहचान मिल रही है। अब लोग मुझसे कह रहे हैं कि हम आपके साथ काम करना चाहते हैं। 'मिर्जापुर' भी शायद ऐसे ही मिली। मैंने इसके लिए 12 किलो वजन बढ़ाया और गंजा होकर ठेठ यूपी के आदमी जैसा दिखा। हॉलीवुड में और कौन सी फिल्में कर रहे हैं?
दो फिल्में हैं। अगले हफ्ते इनकी शूटिंग शुरू करने जा रहा हूं। यह एक नॉन-फिक्शन किताब पर आधारित बायोपिक है। फिल्म में इराक युद्ध की पृष्ठभूमि है। दूसरी फिल्म के बारे में मुझे बात करने की इजाजत नहीं है। बात की तो फिल्म हाथ से निकल जाएगी।
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अली फजल
सिनेमा के अलावा और किस चीज के लिए समय निकालते हैं? यह साल मेरे घर के नाम रहा, क्योंकि वहां कुछ इमरजेंसी हुईं। मां की एक सर्जरी हुई। मामी की सीरियस सर्जरी हुई। अच्छा यह था कि मेरे दो शूट लखनऊ में हुए और मैं अपनों के लिए घर में मौजूद था। जब समय मिलता है, तो लिखना पसंद करता हूं। आने वाले समय में मैं फिल्में डायरेक्ट भी करना चाहता हूं। वह समय कब आएगा? एक शॉर्ट फिल्म है, जिसमें हॉलीवुड के प्रोड्यूसर पैसा लगा रहे हैं। शायद जनवरी में शूट करूं। फीचर फिल्म में अभी वक्त है, लेकिन स्क्रिप्ट पर काम शुरू कर चुका हूं। क्या हॉलीवुड में सीखने के ज्यादा मौके होते हैं? वहां लोग काफी उदार हैं। वे कनेक्शन से ज्यादा कंटेंट पर ध्यान देते हैं। हॉलीवुड अब यहां आकर भी कमा रहा है, जाहिर है उनकी अच्छी बातों को नकार नहीं सकते। बॉक्स ऑफिस दूध का दूध पानी का पानी कर देता है।
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