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Ak Vs Ak Review: नेटफ्लिक्स ने इस बार जीता हिंदी मूवी बैटल, कुली नंबर वन पर भारी पड़ी एके वर्सेज एके

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Ak vs Ak - फोटो : अमर उजाला
Movie Review: एके वर्सेज एके
कथा, पटकथा: अविनाश संपत
संवाद: अनुराग कश्यप
निर्देशक: विक्रमादित्य मोटवाने
कलाकार: अनिल कपूर, अनुराग कश्यप, सोनम कपूर, हर्षवर्धन कपूर, बोनी कपूर आदि।
रेटिंग: ***1/2

सिनेमा सिर्फ एक नायक और एक नायिका के मिलने बिछड़ने पर ही टिका रहने वाला खेल नहीं है। इस खेल में खेल खेल में बहुत सारे खेल हो सकते हैं। हिंदी सिनेमा के तयशुदा फॉर्मूले को तोड़ने वाले निर्देशकों में शुमार रहे विक्रमादित्य मोटवाने ने इस बार एक अलग ही खेल रचा है। ये एक ऐसा खेल है जिसमें नकली कहानी का खेल भी असली जैसा दिखता है। और, असली का आभास शुरू से आखिर तक बनाए रखने के लिए अनिल कपूर ने अपनी इज्जत के तिया पांचे का खेल किया है। अनुराग कश्यप ने अपनी बेइज्जती नवाजुद्दीन सिद्दीकी तक से करवाने का खेल खेला है। और, विक्रमादित्य मोटवाने? फिल्म देखिए, फिर खुद फैसला कीजिए।

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Ak vs Ak - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
रिव्यू शुरू करने से पहले वैधानिक चेतावनी जरूरी है। अनुराग कश्यप के फैंस को तो पता ही होता है कि उनकी फिल्में मोबाइल या लैपटॉप पर ईयर फोन व हेडफोन लगाकर ही देखनी होती है। लेकिन, अगर अनिल कपूर के फैंस जोश में आकर ड्राइंग रूम के बड़े वाले स्मार्ट टीवी पर ये फिल्म देखने की तैयारी में हैं तो प्लीज अलर्ट रहिएगा। अनुराग की सोहबत में इस बार अनिल कपूर ने भी खूब गालियां दी हैं। सिचुएशन के हिसाब से उनका ये गालियां देना सहज भी लगता है। ध्यान रहे कि फिल्म के संवाद अनुराग कश्यप ने ही लिखे हैं, हालांकि विक्रमादित्य ने यहां ध्यान ये रखा है कि फिल्म की कहानी और पटकथा पर इसके ओरीजनल लेखक अविनाश संपत की छाप बनी रहे। फिल्म का पूरा खाका अविनाश का ही खींचा हुआ है और क्लाइमेक्स में दर्शकों को कहानी की अंतर्धारा समझाने के लोभ से अगर विक्रमादित्य बच सके होते तो ये फिल्म क्लासिक फिल्मों की कैटेगरी में शुमार होती।
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Ak vs Ak - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘एके वर्सेज एके’ फिल्म के अंदर चलती फिल्म है। किरदारों ने अपना ही चोला पहना हुआ है। अनिल कपूर का रोल अनिल कपूर ही कर रहे हैं। अनुराग कश्यप का रोल भी अनुराग कश्यप का ही है। नकली टाइप की एक डॉक्यूमेंट्री बनाने का ये प्रचलन सिनेमा का नया प्रयोग है। फिल्म में अनिल कपूर के भाई बोनी कपूर, बेटा हर्षवर्धन, बेटी सोनम उनका निजी स्टाफ सब कुछ असली दुनिया के हैं, बस काम वह एक कहानी में कर रहे हैं। कहानी की शुरूआत एक संवाद कार्यक्रम से होती है जिसमें अनुराग गुस्से में आकर अनिल कपूर के चेहरे पर पानी फेंक देते हैं। फिल्म बिरादरी इसके बाद उनका बहिष्कार करती दिखाई जाती है, यहां तक कि नवाजुद्दीन सिद्दीकी भी उनका फोन काट देते हैं। करियर बचाने के लिए अनुराग एक ऐसी फिल्म बनाने निकलते हैं जिसमें वह सोनम का अपहरण कर लेते हैं और अनिल कपूर के पास उसे बचाने के लिए वक्त पहले से तय होता है। और, इस सबके दौरान कैमरा बंद नहीं होना है।

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Ak vs Ak - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘एके वर्सेज एके’ एक तरह से अनिल कपूर की शोरील है। 40 साल हो गए इस अभिनेता को परदे पर तीन पीढ़ियों का मनोरंजन करते। पूरा का पूरा सिनेमा इस दौरान दो तीन बार बदल चुका है। वह मेलोड्रामा के दौर के सुपरस्टार रहे हैं। अब सिनेमा हकीकत से गलबहियां कर रहा है। बदलते दौर के निर्देशकों के साथ तारतम्य बिठा पाने की अनिल कपूर अद्भुत मिसाल हैं। फिल्म पूरी तरह से उन्हीं के कंधों पर है। फिल्म में कोई हीरोइन नहीं है। कोई गाना नहीं है। टुकड़ों टुकड़ों में जो गाना बार बार बजता भी है वो है, ‘माई नेम इज लखन’। परदे पर अनिल कपूर यहां भी बिल्कुल सहज दिखे। वैसे ही जैसे एक बाप अपनी बेटी के किडनैप हो जाने पर परेशान होगा, वैसा ही वह भी करते दिखे। पता नहीं क्यों बार बार प्रेम प्रताप पटियालेवाला यहां याद आता रहा। उनकी कलाकारी कुंदन है। सोने के तपने के बाद का अगला स्टेप।

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Ak vs Ak - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अनुराग कश्यप फिल्ममेकर अच्छे रहे हैं, अच्छी बात ये है कि वह अब अपने आसपास के लोगों को अपने जैसा बनाने की कोशिशें करना बंद कर चुके हैं। फिल्म ‘एके वर्सेज एके’ की शुरूआत से एकबारगी को लगता है कि कहीं विक्रमादित्य ने अनुराग का चोला तो नहीं पहन लिया लेकिन वह जल्दी ही इससे बाहर आ जाते हैं। विक्रमादित्य ने इस फिल्म में अपना असली लोहा फिर से दिखाया है। इसी पर टिके रहकर उनका सिनेमाई करिश्मा फौलाद बन सकता है। फैंटम फिल्म्स की खासियत भी यही थी कि इसमें अतरंगी सोच वाले बहुरंगी फिल्मकारों का चौघड़ा जमा था। धक्के, झटके (और गालियां भी) खाकर ये चौकड़ी फिर से अपने असली रंग में लौट रही है। फिल्म ‘एके वर्सेज एके’ का यही हासिल है। नए तरह के सिनेमा की तलाश में रहने वालों के लिए हिंदी सिनेमा से निकली ये पेशकश जाते हुए साल की निशानी है। उम्मीद यही है कि आने वाले साल में परिवर्तनों का ये दौर यूं ही जारी रहे।



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