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Amrita Pritam: अपनी जिंदगी को अपने ढंग से जीने का साहस दिखाया, सामाजिक बंधन भी तोड़े और कलम से बिखेर दिया जादू

Sat, 31 Aug 2024 07:18 AM IST
विशाल वर्मा एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला

सार

31 अगस्त, 1919 को गुजरांवाला (अब पाकिस्तान) में जन्मीं अमृता प्रीतम ने पंजाबी और हिंदी साहित्य में पहचान बनाते हुए साहित्य पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। अमृता प्रीतम भारतीय साहित्य की वह आवाज हैं, जो दर्द, प्रेम और सच्चाई की तासीर में डूबी हुई है। उन्होंने अपनी जिंदगी को अपने तरीके से जीने का साहस दिखाया था। उनका निधन 31 अक्तूबर, 2005 को हुआ था।
 
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अमृता प्रीतम - फोटो : इंस्टाग्राम @amritapritam.official
31 अगस्त, 1919 को गुजरांवाला (अब पाकिस्तान) में जन्मीं अमृता प्रीतम ने पंजाबी और हिंदी साहित्य में पहचान बनाते हुए साहित्य पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। अमृता प्रीतम भारतीय साहित्य की वह आवाज हैं, जो दर्द, प्रेम और सच्चाई की तासीर में डूबी हुई है। उन्होंने अपनी जिंदगी को अपने तरीके से जीने का साहस दिखाया था। उनका निधन 31 अक्तूबर, 2005 को हुआ था।
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अमृता प्रीतम - फोटो : इंस्टाग्राम @poetsays__
अमृता प्रीतम के लेखन में जो संवेदनशीलता और गहराई थी, उसने उन्हें साहित्य के शिखर पर पहुंचा दिया। उनका पहला कविता संग्रह 16 साल की उम्र में छपा था। उनकी शुरुआती कविताएं रोमांटिक थीं, लेकिन धीरे-धीरे उनकी कलम सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों को भी छूने लगी थी। विभाजन की त्रासदी ने उनके लेखन को एक नया मोड़ दिया। उनकी नज्म ‘आज आखां वारिस शाह नूं’ उस समय की पीड़ा और वेदना का एक अद्वितीय दस्तावेज है।
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अमृता प्रीतम - फोटो : इंस्टाग्राम @kitabganj_
अमृता प्रीतम ने अपनी साहित्यिक यात्रा में कई उपन्यास और कविता संग्रह लिखे। उनकी आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’में उनके जीवन के संघर्षों, प्रेम और सामाजिक बाधाओं का ब्यौरा मिलता है। 'पिंजर’ उनका एक महत्वपूर्ण उपन्यास है, जिसमें विभाजन की त्रासदी और महिलाओं की दशा का चित्रण किया गया है। यह उपन्यास बाद में एक सफल फिल्म का आधार भी बना। उनकी अन्य महत्वपूर्ण रचनाओं में ‘एक सवाल’, ‘सागर और सीपियां’ और ‘दिल की गलियां’ आदि शामिल हैं।

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अमृता प्रीतम और इमरोज - फोटो : इंस्टाग्राम @kitabganj_
अमृता प्रीतम का जीवन संघर्षों से भरा रहा। उनके पति के साथ वैवाहिक जीवन संतोषजनक नहीं रहा, जिसके चलते उन्होंने सामाजिक बंधनों को तोड़ते हुए साहिर लुधियानवी से प्रेम किया। हालांकि, यह प्रेम भी उनके लिए संघर्ष भरा रहा। इसके बाद उनका रिश्ता चित्रकार इमरोज के साथ रहा, जो उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बने। अमृता ने हमेशा अपनी स्वतंत्रता और आत्मसम्मान को महत्व दिया।

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अमृता प्रीतम और इमरोज - फोटो : इंस्टाग्राम @amritapritam.official
अमृता की साहित्यिक यात्रा एक ऐसे खुश्बूदार फूल की तरह थी, जो धीरे-धीरे खुलता गया और अपनी खुश्बू फैलाता रहा। अमृता की लेखनी के जादू को महसूस करने के लिए एक नजर उनकी इन पंक्तियों पर डालें- "मैं तैनू फ़िर मिलांगी, कित्थे? किस तरह पता नई, शायद तेरे ताखियल दी चिंगारी बण के, तेरे केनवास ते उतरांगी, जा खोरे तेरे केनवास दे उत्ते, इक रह्स्म्यी लकीर बण के, खामोश तैनू तक्दी रवांगी..."

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