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Independence Day 2022: आजादी के बाद इन पांच संस्थानों की मदद से डाली गई थी नए भारत की नींव, पढ़ें

Fri, 05 Aug 2022 05:01 PM IST
सुभाष कुमार एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला

सार

वह कौन से घटक/संस्थान थे जिन्होंने इस देश के लोकतंत्र को और बेहतर बनाने में मदद की। कैसे इस देश का लोकतंत्र और अधिक मजबूत हुआ। वह कौन से संस्थान थे जिन्होंने आजादी के बाद नए भारत के निर्माण में मदद की? आइए जानते हैं-: 
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Azadi Ka Amrit Mahotsav - फोटो : Amar Ujala
15 अगस्त, 1947 वो दिन जब एक नए भारत की शुरुआत हुई थी। अंग्रेजों की गुलामी से आजादी की खुशी और बंटवारे का दर्द लिए इस देश ने नई उर्जा के साथ एक सफर की शुरुआत की थी। जो आज 75 वर्ष बाद भी निरंतर जारी है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र ने इन 75 सालों में कई उतार-चढ़ाव देखें। कभी अकाल, कभी युद्ध तो एक वक्त इमरजेंसी भी। हालांकि, इन सभी उतार-चढ़ाव के बीच जिस चीज ने देश को निरंतर आगे बढ़ाया, वह था इसका लोकतंत्र और संविधान। लेकिन वह कौन से घटक/संस्थान थे जिन्होंने इस देश के लोकतंत्र को और बेहतर बनाने में मदद की। कैसे इस देश का लोकतंत्र और अधिक मजबूत हुआ। वह कौन से संस्थान थे जिन्होंने आजादी के बाद नए भारत के निर्माण में मदद की? आइए जानते हैं-: 
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Indian Parliament - फोटो : Social Media
संसद
भारतीय संसद को देश के लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है। संसद के तीन अंग राष्ट्रपति, राज्यसभा और लोकसभा हैं। आजाद भारत में लोकसभा के पहले सत्र की शुरुआत 13 मई, 1952 को की गई थी। वहीं, 16 मई, 1952 को देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने सदन को संबोधित किया था। उस वर्ष पहली बार लोकसभा में सांसद आम जनता द्वारा सीधे तौर पर निर्वाचित हो कर पहुंचे थे। आजाद भारत के इतिहास का यह एक सुनहरा दिन था, क्योंकि देश के विकास और मजबूती की ओर कदम बढ़ाने का कार्य शुरू हुआ था। आज जब देश अपना 75वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है तो इतने वर्षों में भारत की संसद ने कई बड़े फैसले किए और बिल पारित किए हैं, जिन्होंने इस देश और समाज के विकास में अहम योगदान दिया है। 
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social media
सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट मतलब सर्वोच्च न्यायालय देश का शीर्ष न्यायालय है। देश के संविधान के लागू होने के बाद संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत भारत का सर्वोच्च न्यायालय भी अस्तित्व में आया। न्यायलय की पहली बैठक 28 जनवरी, 1950 को हुई थी। बता दें कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित कानून या फैसला देश के सभी न्यायालयों के लिये बाध्यकारी होता है। सुप्रीम कोर्ट को मुख्य रूप से संविधान का रक्षक माना जाता है। समय-समय पर देश के सर्वोच्च न्यायालय ने कई ऐसे फैसले किए हैं जो देश और संविधान के लिए अहम साबित हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट के पहले मुख्य न्यायाधीश हीरालाल जे. कानिया से लेकर वर्तमान मुख्य न्यायाधीश एनवी रमणा तक, देश ने कुल 48 मुख्य न्यायाधीश देखें हैं।

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निर्वाचन आयोग - फोटो : Election Commission
निर्वाचन आयोग
आजादी के बाद जब भारत ने लोकतंत्र का रास्ता अपनाया तो सबसे जरूरी बात थी इसकी शक्तियों को आम जनता के हाथों में देना। इसी को ध्यान में रखते हुए  25 जनवरी 1950 को भारत के निर्वाचन आयोग का गठन किया गया था। यह एक स्वायत्त संवैधानिक प्राधिकरण है जो भारत में निर्वाचन प्रक्रियाओं के संचालन के लिए उत्तरदायी है। भारत में लोक सभा, राज्य सभा, राज्य विधान सभाओं और देश में राष्ट्रपति एवं उप-राष्ट्रपति के पदों के लिए निर्वाचनों का संचालन करता है। संविधान के अनुच्छेद 324 में देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग को सौंपी गई है। देश में अब तक 17 बार  लोकसभा के चुनाव हो चुके हैं। वहीं, अनगिनत बार निर्वाचन आयोग ने राज्य, राज्य सभा और अन्य चुनाव का आयोजन कराया है। साल 1950 में सुकुमार सेन को देश का पहले मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया गया था। वहीं, वर्तमान में राजीव कुमार इस पद पर आसीन हैं। अब तक देश में कुल 25 मुख्य चुनाव आयुक्त रह चुके हैं। चाहे सियाचिन या लद्दाख की बर्फीली ठंड हो या राजस्थान की तपती गर्मी। देश के हर कोने में निर्वाचन आयोग ने अपनी भूमिका निभाई है। 
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President Draupadi Murmu - फोटो : Amar Ujala
राष्ट्रपति
देश के राष्ट्रपति को देश का पहला नागरिक माना जाता है। राष्ट्रपति ही देश के प्रमुख और सशस्त्र बलों के कमांडर इन चीफ होते हैं। संविधान के अनुच्छेद 54 में देश में राष्ट्रपति के चुनाव का उल्लेख किया गया है। आजादी के बाद से डाक्टर राजेंद्र प्रसाद से लेकर द्रौपदी मुर्मू तक देश ने 15 राष्ट्रपति प्राप्त किए हैं। यह भारत के लोकतंत्र की खबसूरती हीं है कि देश के आदिवासी समुदाय की महिला भी अब राष्ट्रपति के पद पर आसीन हैं। यूं तो राष्ट्रपति सरकार के मंत्रीमंडल की सलाह पर कार्य करते हैं लेकिन उन्हें अपने विवेक के अनुसार शक्तियों के इस्तेमाल का भी अधिकार है। वर्ष 1987 में तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने पोस्ट ऑफिस संशोधन बिल, 1986 के मामले में अपने पॉकेट वीटो का इस्तेमाल किया था। यह विधेयक कभी कानून नहीं बन सका। राष्ट्रपति राज्यसभा और लोकसभा दोनो सदनों के संयुक्त सत्र का संबोधन भी करते हैं।  राष्ट्रपति द्वारा ही देश के प्रधानमंत्री, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश और मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति करते हैं। 
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देश का पहला मंत्रिमंडल - फोटो : Social Media
केंद्रीय मंत्री परिषद
देश की संसद, सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रपति और निर्वाचन आयोग ने भारत को एक बेहतर आयाम देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ही है लेकिन इसमें केंद्रीय मंत्री परिषद का भी योगदान अनदेखा नहीं किया जा सकता है। देश के संविधान में अनुच्छेद 74 में मंत्रिपरिषद के गठन के बारे में उल्लेख किया गया है। बता दें कि इसी मंत्री परिषद के शीर्ष नेता प्रधानमंत्री होते हैं। देश के मंत्री परिषद की मुख्यत: तीन श्रेणियां निर्धारित की गई हैं। कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री और राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार। मंत्री बनने के लिए राज्यसभा या लोकसभा दोनों में से किसी एक का सदस्य होना जरूरी होता है। हालांकि, संविधान के अनुसार मंत्री परिषद लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है। राष्ट्रपति के द्वारा देश के प्रधानमंत्री की नियुक्ति की जाती है। वहीं, प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति देश के मंत्री परिषद की नियुक्ति करते हैं। देश में विकास से लेकर समाज-सुधार तक के सभी कार्य इसी मंत्रीपरिषद के द्वारा किए जाते हैं। इस सभी ने भारत के लोकतंत्र को मजबूत करने और देश को आगे बढ़ाने में अपना अहम योगदान दिया है। 
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