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कौन हैं ब्रू शरणार्थी? जिन्हें बसाने के लिए करोड़ों खर्च कर रही है सरकार

Sat, 18 Jan 2020 01:38 PM IST
Garima Garg एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
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ब्रू-रियांग शरणार्थियों - फोटो : PTI
मिजोरम के 30 हजार से ज्यादा ब्रू-रियांग शरणार्थियों को स्थायी रूप से त्रिपुरा में बसाए जाने के लिए केंद्र सरकार ने 600 करोड़ रुपये का पैकेज देने का एलान किया है। इस संबंध में गुरुवार को एक त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर हुए हैं। केंद्र सरकार और प्रतिनिधियों के बीच हुए समझौते के तहत ब्रू-रियांग शरणार्थियों को चार लाख रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट के साथ 40 से 30 फीट का प्लॉट और दो साल तक 5,000 रुपये प्रति माह की नकद सहायता और मुफ्त राशन दिया जाएगा।

बता दें कि ब्रू आदिवासी समुदाय के करीब 35 हजार सदस्य त्रिपुरा के सात कैंपों में बीते 22 सालों से रह रहे हैं। अब केंद्र सरकार ने मिजोरम के इन आदिवासी शरणार्थियों की लंबे समय से चली आ रही समस्या को समाप्त करके इन्हें स्थायी रूप से त्रिपुरा में बसाने का फैसला किया है।

केंद्र की योजना में क्या क्या?

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ब्रू-रियांग शरणार्थियों - फोटो : PTI
  • केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में ब्रू शरणार्थियों के प्रतिनिधियों और त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लव देब और मिजोरम के उनके समकक्ष जोरमथांगा ने इस बाबत एक समझौते पर हस्ताक्षर किया है।
  • ब्रू समुदाय मिजोरम का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक आदिवासी समूह है। इस जनजातीय समूह के सदस्य म्यांमार के शान प्रांत के पहाड़ी इलाके के मूल निवासी हैं जो कुछ कुछ सदियों पहले म्यांमार से आकर मिजोरम में बसे थे।
  • मिजोरम की बहुसंख्यक जनजाति मिजो इन्हें 'बाहरी' कहती है।

मिजोरम से त्रिपुरा क्यों आए 'ब्रू'?

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ब्रू-रियांग शरणार्थियों - फोटो : PTI
  • 1996 में ब्रू समुदाय और बहुसंख्यक मिजो समुदाय से स्वायत्त जिला परिषद के मुद्दे पर खूनी संघर्ष हुआ। तब अक्तूबर 1997 में ब्रू जनजाति की करीब आधी आबादी (लगभग पांच हजार परिवारों) ने पलायन कर त्रिपुरा में शरण ले ली थी।
  • त्रिपुरा में ये कैंपों में रह रहे हैं। त्रिपुरा लगातार यह कोशिशें करता रहा कि ब्रू वापस मिजोरम लौटें। केंद्र सरकार के साथ मिलकर इस मसले को सुलझाने की कोशिशें की गईं।
कुछ परिवारों को वापस भेजने में मिली कामयाबी
  • सरकारी मध्यस्थता से कुछ परिवार वापस लौटे भी और उन्हें सरकारी सहायता भी दी गईं। 2012 की पीआईबी की प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक पांच हजार विस्थापित ब्रू परिवारों में से 800 को वापस भेजा जा चुका था।
  • एक अन्य विज्ञप्ति के मुताबिक बीते 10 सालों में हो हज़़ार के करीब ब्रू परिवारों को वापस भेजा जा चुका है। लेकिन 2011, 2012 और 2015 में मिज़ो में गैर सरकारी संगठनों ने ब्रू जनजातियों की वापसी का विरोध किया तो इस प्रक्रिया पर विराम लग गया। 2018 में इन्हें वापस भेजने के लिए एक समझौता हुआ लेकिन वह लागू नहीं हो सका।

विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह - 

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ब्रू समुदाय के लोग (फाइल फोटो)
  • ब्रू जनजातियों को रियांग भी कहा जाता है। गृह मंत्रालय ने चेंचू, बोडो, गरबा, असुर, कोतवाल, बैगा, बोंदो, मारम नागा, सौरा जैसे जिन 75 जनजातीय समूहों को विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (पीवीटीजी) के रूप में वर्गीकृत किया है, रियांग उनमें से एक हैं। ये 75 जनजातीय समूह देश के 18 राज्यों और अण्डमान, निकोबार द्वीप समूह क्षेत्र में रहते हैं।
  • त्रिपुरा और मिजोरम के अलावा इस जनजाति के सदस्य असम और मणिपुर में भी रहते हैं।
  • इनकी बोली रियांग है जो तिब्बत-म्यांमार की कोकबोरोक भाषा परिवार का अंग है। रियांग बोली में 'ब्रू' का अर्थ 'मानव' होता है।
  • पूर्वोत्तर की अन्य जनजातियों की तरह रियांग जनजाति के लोगों की शक्ल भी मंगोलों से मिलती-जुलती है।
  • त्रिपुरी के बाद यह त्रिपुरा की दूसरी सबसे बड़ी जनजाति है। रियांग जनजाति मुख्यतः दो बड़े गुटों में विभाजित है-मेस्का और मोलसोई।

खेती-बुनाई पर आश्रित हैं ब्रू

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ब्रू जनजाति की महिलाओं का फाइल फोटो
  • यह मुख्यतः कृषि पर निर्भर रहने वाली जनजाति है। ये पहले झूम की खेती करते थे। इसमें जंगल के एक हिस्से को साफ करके वहां खेती की जाती है। जंगल के एक हिस्से में फसल उगाने और उसके उपयोग के बाद यह जनजाति दूसरे हिस्से में दोबारा इसी पद्धति से खेती करता था। लिहाजा, ये बंजारा जाति समूह रहे हैं। लेकिन अब वे खेती के आधुनिक तौर-तरीके अपना रहे हैं।
  • जीके घोष की पुस्तक इंडियन टेक्सटाइल- पास्ट ऐंड प्रेजेंट के मुताबिक इस समुदाय की महिलाएं बुनाई का काम करती हैं। हालांकि, ये कुछ गिने चुने कपड़े ही बुनती हैं जो इस समुदाय के लोगों के तन को ढकने के काम आते हैं।
  • महिलाएं जो परिधान बुनती हैं उनके नाम रिनाई (Rinai), रिसा (Risa), बासेई (Basei), पानद्री (Pandri), कुताई (Kutai), रिकातु (Rikatu), बाकी (Baki), कामचाई (Kamchai) हैं।

ये पहनते हैं ब्रू - 

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amit shah - फोटो : ANI
  • रिनाई को महिलाएं कमर से नीचे तो रिसा वक्ष पर पहनती हैं। बासेई वे बच्चों को अपने शरीर से बांधने के लिए इस्तेमाल करती हैं।
  • वहीं रिनाई की तरह पुरुष अपने कमर के नीचे पानद्री पहनते हैं। कुताई शर्ट को कहते हैं, जिसे पुरुष और महिलाएं दोनों पहन सकते हैं।
  • रिकातु और बाकी (यह रिकातु की तुलना में भारी होता है) आयताकार वस्त्र हैं जिन्हें शरीर को लपेटने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
  • कामचाई को सिर पर लपेटने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
  • अपने ही समुदाय में शादी करने वाली यह जनजाति पारंपरिक वेशभूषा धारण करती है और नृत्य इसके जीवन का अभिन्न अंग है।
  • धार्मिक रूप से हिंदू धर्म के वैष्णव संप्रदाय को मानने वाली रियांग जनजाति के प्रमुख को राय कहा जाता है, जो विवाह और तलाक की अनुमति देता है और आपसी झगड़े निपटाता है। 
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