साल की शुरुआत के साथ ही आम से लेकर खास तक इस बात की कामना करते हैं कि आने वाला साल उनके जीवन में खुशियां और उपलब्धियां लेकर आए। साथ ही साल के अंत में इस बात की पड़ताल भी की जाती है कि गुजरे साल में उन्होंने क्या पाया और क्या खोया? आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ नेताओं के बारे में जिनके लिए इस साल की शुरुआत तो अपार संभावनाओं के साथ हुई, लेकिन छोटी सी गलती ने उनके लिए साल 2015 को एक बुरे सपने में बदल दिया।
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देखिए कैसे साल 2015 ने डूबो दी इन 5 नेताओं की लुटिया
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किरण बेदी : भारत की पहली महिला आईपीएस और अपनी तेजतर्रार छवि के लिए क्रेन बेदी के नाम से पहचान रखने वाली किरण बेदी के जीवन में साल 2015 एक अजीब मोड़ लेकर आया। साल की शुरुआत के साथ ही दिल्ली में विधानसभा चुनाव की सरगर्मी अपने चरम पर थी। बीजेपी ने एक अप्रत्याशित कदम उठाते हुए पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी को दिल्ली के भावी मुख्यमंत्री के तौर पर पेश कर दिया। अचानक किरण बेदी सुर्खियों में आ गईं।
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महज आठ महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी की भारी सफलता के बाद दिल्ली विधानसभा में भाजपा की सफलता लगभग तय मानी जा रही थी। सीएम उम्मीदवार घोषित होते ही किरण बेदी ने भी जनता को ये बताना शुरु कर दिया कि सत्ता में आने के बाद वो कैसे काम करेंगी। लेकिन चुनाव परिणाम ने सारे चुनावी कयासों को सिरे से खारिज कर दिया और आम आदमी पार्टी को ऐतिहासिक सफलता मिली। जहां आप को इस चुनाव में 70 में से 67 सीटें मिलीं वहीं भाजपा केवल 3 सीटें ही जीत पाई। खुद किरण बेदी भी चुनाव हार गईं। इसके बाद राजनीतिक परिदृश्य से लेकर सामाजिक गतिविधियों तक से वो अचानक गायब सी हो गईँ।
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शाजिया इल्मी : सफल पत्रकार के तौर पर अपना स्थापित कैरियर छोड़कर अन्ना के जनलोकपाल आंदोलन में कूद पड़ीं शाजिया इल्मी ने जल्द ही राजनीति में आने का फैसला किया और आम आदमी पार्टी की स्टार नेता बन गईं। लोकसभा चुनाव में हार के बाद आप नेता आशुतोष के साथ उनका विवाद इस कद बढ़ा कि उन्होंने दिल्ली विधानसभा चुनाव से ठीक पहले 16 जनवरी 2015 को उन्होंने भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने का फैसला किया। चुनाव के पहले उनके इस कदम को बुद्घिमानी भरा कदम माना गया लेकिन दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद किरण बेदी की तरह शाजिया भी सार्वजनिक जीवन सी अदृश्य सी हो गईं।
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अरविंदर सिंह लवली : 1998 में पहली बार विधायक चुने गए लवली सबसे युवा विधायकों में से एक थे। फरवरी 2015 में हो रहे विधानसभा चुनाव से पहले लवली को ही कांग्रेस का सबसे मजबूत नेता माना जा रहा था। उन्हें ही मुख्यमंत्री कांग्रेस का भावी सीएम कैंडीडेट माना जा रहा था। लेकिन भाजपा की तरह कांग्रेस ने भी चुनाव से ठीक पहले तमाम अटकलों को खारिज करते हुए अजय माकन को सीएम उम्मीदवार घोषित कर दिया। कांग्रेस के इस फैसले के असर का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसे एक भी सीट पर जीत नहीं मिली। इसके साथ ही तेजी से उभर रहे युवा नेता लवली के राजनीतिक कैरियर पर भी ब्रेक लग गया।
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योगेंद्र यादव : अन्ना के भ्रष्टाचार विरोध आंदोलन ने देश के जाने-माने चुनाव विश्लेषक के तौर पर स्थापित हो चुके योगेंद्र यादव को भी अपनी ओर खींच लिया। आंदोलन के बाद राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने राजनीति में उतरने का फैसल किया। आम आदमी पार्टी के सशक्त नेताओं में गिने जाने वाले योगेंद्र यादव के लिए साल 2015 बुरे सपने की तरह आया। दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ उनका मतभेद इतना बढ़ा कि 4 मार्च 2015 को आप की पोलिटिकल अफेयर्स कमेटी से बेदखल कर दिया गया। 28 मार्च को उन्हें पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से हटाने के बाद अप्रैल में पार्टी से निष्कासित कर दिया गया।
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प्रशांत भूषण : देश के जाने माने वकील प्रशांत भूषण अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में टीम अन्ना के सबसे खास सदस्यों में से एक थे। जनलोकपाल बिल को बनाने में उनकी खास भूमिका थी। आंदोलन में फूट के बाद उन्होंने अरविंद केजरीवाल का साथ दिया और आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्य के तौर पर सामने आए। पार्टी में चल रही अनयिमितताओं की ओर संकेत करने के साथ ही केजरीवाल से उनका विवाद बढ़ने लगा। इस बीच 4 मार्च को उन्हें पार्टी की पोलिटिकल अफेयर्स कमेटी और 28 मार्च को राष्ट्रीय कार्यकारिणी से हटाने के बाद अप्रैल में पार्टी से निकाल दिया गया।