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जानिए क्यों सैलरी, गाड़ी या बंगला न लेने के बावजूद 'लाभ का पद' मामले में फंसे 'आप' के 20 विधायक 

Sat, 20 Jan 2018 10:00 AM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
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शुक्रवार को चुनाव आयोग ने आम आदमी पार्टी को एक बड़ा झटका देते हुए इसके 20 विधायकों को अयोग्य घोषित करने की सिफारिश राष्ट्रपति को भेज दी। आप के इन 20 विधायकों पर लाभ के पद का इस्तेमाल करने का आरोप लगा है। आइए जानते हैं कि आखिर क्यों कोई वेतन, गाड़ी, बंगला या घर न लेने के बावजूद चुनाव आयोग ने इन विधायकों को लाभ के पद का उपयोग करने का दोषी माना है... 
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सौरभ भारद्वाज
चुनाव आयोग का फैसला आते ही आप के प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज ने कहा कि आयोग ने आप के विधायकों को लाभ के पद का दोषी माना है जबकि संसदीय सचिव के पद पर तैनात 20 में से कोई भी विधायक न तो वेतन लेता था न ही कोई सरकारी बंगला या गाड़ी का इस्तेमाल करता था। इसके बावजूद आयोग ने किस आधार पर इन्हें अयोग्य साबित किया है ये समझ से परे है।
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- फोटो : अमर उजाला
सौरभ ने यह भी कहा चुनाव आयोग ने अपना फैसला सुनाने से पहले आप के 20 में से एक भी विधायक को न तो चुनाव आयोग बुलाया और न ही उनकी प्रॉपर्टी या बैंक खातों की जांच की। जबकि किसी भी आरोप को साबित करने से पहले कम से कम आरोपी विधायकों को अपना पक्ष रखने का मौका तो दिया ही जाना चाहि‌ए था।

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हालांकि इस मामले में संविधान और कानून के जानकारों का कहना है कि असल में संविधान में लाभ के पद की जो व्याख्या की गई है उसके मुताबिक कोई विधायक या सांसद अपने पद पर रहते हुए किसी ऐसे पद का उपयोग नहीं कर सकता जिसमें वेतन, पेंशन जैसा कोई भी लाभ दिया जाता है। हालांकि संविधान के इसी भाग में यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि कुछ ऐसे पद भी हैं जिन्हें लाभ का पद माना गया है। 
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- फोटो : self
यानि यह स्पष्ट है कि लाभ का पद का मतलब सिर्फ इतना नहीं है कि कोई विधायक या सांसद वेतन या अन्य कोई लाभ लेता है या नहीं। इसका मतलब यह भी है कि अगर वह लाभ के पद के तहत आने वाला कोई भी पद धारण करता है तो भी उसे इसका दोषी माना जाएगा। विशेषज्ञों के मुताबिक संसदीय सचिव का पद भी लाभ के पद के तहत आता है और इसी पद पर आप के 20 विधायकों को सरकार द्वारा नियुक्त किया गया था।
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राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद - फोटो : self
मालूम हो कि केजरीवाल सरकार ने पिछली तारीख से कानून बनाकर संसदीय सचिव पद को लाभ के पद के दायरे से बाहर निकालने की कोशिश की थी, लेकिन राष्ट्रपति ने बिल लौटा दिया था। दिल्ली सरकार ने मार्च 2015 में 21 आप विधायकों को संसदीय सचिव के पद पर नियुक्त किया था जिसे दिल्ली के एक वकील प्रशांत पटेल ने लाभ का पद बताकर राष्ट्रपति के पास शिकायत कर सभी 21 विधायकों की सदस्यता खत्म करने की मांग की थी। राष्ट्रपति ने मामले को चुनाव आयोग के पास भेज दिया था।
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