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Uttarkashi Cloud Burst: उत्तराखंड आपदा...कटते जंगल, पर्यटन के बढ़ते दबाव से ढीले पड़े पहाड़, खतरा बढ़ा; खुलासा

Thu, 07 Aug 2025 08:32 AM IST
शाहरुख खान अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

उत्तराखंड में 20 वर्षों में 1.85 लाख हेक्टेयर जंगल कटे हैं। पर्यटन दबाव तीन गुना बढ़ गया है। इससे हिमालयी पर्यावरण को बड़ा नुकसान हुआ है। राज्य का भौगोलिक क्षेत्रफल 53,483 वर्ग किमी है।
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उत्तरकाशी में बादल फटने से तबाही - फोटो : पीटीआई
उत्तराखंड में बीते दो दशक में विकास परियोजनाओं की अंधाधुंध दौड़ और बेतरतीब पर्यटन वृद्धि ने हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर संकट में डाल दिया है। जहां एक ओर 1.85 लाख हेक्टेयर यानी 1,850 वर्ग किलोमीटर जंगलों की कटाई ने पहाड़ों की जलधारण क्षमता और जैव विविधता को कमजोर किया है, वहीं दूसरी ओर पर्यटकों की संख्या तीन गुना बढ़कर 5 करोड़ के पार पहुंच गई है, जिससे पर्वतीय इलाकों पर असहनीय दबाव पड़ा है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि उत्तराखंड में भूस्खलन, जल स्रोतों का सूखना, ग्लेशियर पिघलाव और पारिस्थितिकीय असंतुलन की घटनाएं इसी दोहरे दबाव का परिणाम हैं जिसका असर गंगा-यमुना के मैदानों तक फैल चुका है।
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उत्तरकाशी में बादल फटने से तबाही - फोटो : पीटीआई
1.85 लाख हेक्टेयर वन भूमि विभिन्न विकास कार्यों के लिए डायवर्ट की
उत्तराखंड वन विभाग और केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2005 से 2025 के बीच करीब 1.85 लाख हेक्टेयर वन भूमि विभिन्न विकास कार्यों के लिए डायवर्ट की गई है। यह क्षेत्र दिल्ली (1,484 वर्ग किमी) से बड़ा और गोवा (3,702 वर्ग किमी) का लगभग आधा है। 

 
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उत्तरकाशी में बादल फटने से तबाही - फोटो : पीटीआई
सड़क निर्माण, चारधाम परियोजना, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन, ट्रांसमिशन लाइनें और खनन इन वनों की कटाई के मुख्य कारण रहे हैं। राज्य का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 53,483 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें से 24,305 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल करीब 45.46% वन आच्छादित है। 

 

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उत्तरकाशी में बादल फटने से तबाही - फोटो : पीटीआई
20 वर्षों में 1,850 वर्ग किलोमीटर जंगलों की कटाई का अर्थ है कि राज्य ने अपने कुल वनों का 7.6% हिस्सा खो दिया है। 
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उत्तरकाशी में बादल फटने से तबाही - फोटो : पीटीआई
संतुलन साधना जरूरी
पर्यावरणविद डॉ. अनुज जोशी चेताते हैं, विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन साधे बिना पहाड़ों से इस तरह जंगलों का गायब होना हिमालय की स्थिरता के लिए विनाशकारी है। यदि यही स्थिति रही तो उत्तराखंड में गंगा और यमुना के मैदानों तक आपदाओं की तीव्रता महसूस होगी।
 
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उत्तरकाशी में बादल फटने से तबाही - फोटो : पीटीआई
कटे जंगलों के दुष्परिणाम
भूस्खलन और जलधारण क्षमता में गिरावट वनों की कटाई से पहाड़ों की पकड़ ढीली हुई है जिससे उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, टिहरी और चमोली में भूस्खलन की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं।
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उत्तरकाशी में बादल फटने के बाद तबाही - फोटो : पीटीआई
ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार दोगुनी हुई  वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी की रिपोर्ट के अनुसार जंगलों के क्षरण व तापमान वृद्धि के कारण राज्य के ग्लेशियर अब औसतन 15-20 मीटर प्रति वर्ष की दर से पीछे हट रहे हैं।

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उत्तरकाशी में बादल फटने के बाद तबाही - फोटो : पीटीआई
जैव विविधता पर संकट
कस्तूरी मृग, हिमालयन मोनाल, बर्फीला तेंदुआ जैसी प्रजातियों के आवास क्षेत्र खत्म हो रहे हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ा है।

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उत्तरकाशी में बादल फटने के बाद तबाही, घायलों का इलाज करते डॉक्टर - फोटो : पीटीआई
सूख रहे हैं जलस्रोत
नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (एनआईएम) की रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य के 30% प्राकृतिक जलस्रोत (गाड़-गधेरे) या तो सूख चुके हैं या प्रवाह क्षमता गंवा चुके हैं।

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उत्तरकाशी में बादल फटने के बाद तबाही, बचाव कार्य में जुटे जवान - फोटो : पीटीआई

20वर्षों में 30% जल स्रोत सूखे या धारा कमजोर
पर्यटन का पर्यावरणीय प्रभाव

वाहनों का दबाव व कंपन
चारधाम मार्ग पर प्रतिदिन 20,000 से अधिक वाहनों की आवाजाही हो रही है। इससे पहाड़ों में सूक्ष्म दरारें बढ़ रही हैं, जो भूस्खलन की घटनाओं को जन्म दे रही हैं।
 

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उत्तरकाशी में बादल फटने के बाद तबाही - फोटो : पीटीआई
जलस्रोतों पर दबाव
मसूरी, नैनीताल जैसे हिल स्टेशनों पर जल स्रोतों का जलस्तर गिरा है। 20 वर्षों में 30% प्राकृतिक जल स्रोत या तो सूख गए हैं या उनकी जलधारा कमजोर हो गई है।
 

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उत्तरकाशी में बादल फटने के बाद तबाही - फोटो : पीटीआई
कचरा प्रबंधन की चुनौती
पर्यटन सीजन में राज्य में प्रतिदिन 600 टन कचरा उत्पन्न हो रहा है, जिनमें से अधिकांश पर्वतीय इलाकों में ही फेंका जा रहा है। इससे जलस्रोत प्रदूषित हो रहे हैं और भूमि क्षरण बढ़ रहा है।

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उत्तरकाशी में बादल फटने से तबाही, राहत एवं बचाव कार्य में जुटे जवान - फोटो : पीटीआई
बढ़ता पर्यटन दबाव
उत्तराखंड की स्थायी जनसंख्या वर्ष 2024 के अनुमान के अनुसार 1.16 करोड़ है जबकि राज्य में आने वाले पर्यटकों की संख्या 5.2 करोड़ के पार पहुंच गई है। 2005 में यह संख्या 1.5 करोड़ थी यानी 20 वर्षों में यह आंकड़ा तीन गुना से अधिक हो गया है। चारधाम यात्रा, एडवेंचर टूरिज्म और हिल स्टेशनों की बढ़ती लोकप्रियता के कारण पर्वतीय इलाकों में पर्यटकों का दबाव बेतहाशा बढ़ा है।
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उत्तरकाशी में बादल फटने से तबाही, राहत एवं बचाव कार्य में जुटे जवान - फोटो : पीटीआई
ऋषिकेश, हरिद्वार, मसूरी, नैनीताल, केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में पर्यटकों की भीड़ राज्य की पारिस्थितिकीय संतुलन पर सीधा असर डाल रही है। जीएसआई के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. विपिन जोशी के अनुसार उत्तराखंड के पहाड़ पहले से ही कमजोर भू-संरचना वाले हैं।

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