pc parakh
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पीसी परख
संजय बारू की किताब के प्रकाशित होने के कुछ दिनों के अंदर ही पूर्व कोयला सचिव पी सी परख की किताब आई, ‘क्रुसेडर ऑर कॉन्सपिरेटर? कोलगेट एंड अदर ट्रूथ्स’ जिसमें उन्होंने मनमोहन सिंह की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाए थे। परख कहते हैं, "मनमोहन सिंह एक ऐसी सरकार का नेतृत्व कर रहे थे जिसमें उनके पास बहुत कम राजनीतिक ताकत थी।"
परख का मानना है कि अगर मनमोहन सिंह ने सुधारों को लागू करने और कोयला ब्लॉकों के आवंटन की खुली नीलामी का समर्थन किया होता तो 1.86 लाख करोड़ के कोयला घोटाले से बचा जा सकता था। परख 2005 में रिटायर हो गए थे और उनके खिलाफ सीबीआई ने कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में एक मामला दायर किया है। वह कहते हैं कि मनमोहन सिंह के जूनियर मंत्रियों ने कोयला ब्लॉक आवंटन के मामले में और पारदर्शिता लाने के प्रयासों का पूरी ताकत से विरोध किया लेकिन तब भी प्रधानमंत्री चुप रहे। परख लिखते हैं कि जब भाजपा नेता धर्मेंद्र प्रधान ने संसदीय समिति की बैठक में उनका अपमान किया तो उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा देने का फ़ैसला कर लिया। जब वो 17 अगस्त 2005 को प्रधानमंत्री से मिलने गए और उन्हें अपना इस्तीफा देने का कारण बताया तो मनमोहन सिंह बोले, "मुझे भी रोज़ इस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। लेकिन अगर मैं इन मुद्दों पर रोज-रोज इस्तीफा देने लगा तो इससे देश का कोई हित नहीं होगा।" परख कहते हैं, "एक ऐसी सरकार का नेतृत्व करने की वजह से जिसमें उनकी कोई राजनीतिक ताकत नहीं थी, मनमोहन सिंह की छवि को गहरा धक्का लगा है, हांलाकि उनकी निजी ईमानदारी का रिकॉर्ड पूरी तरह से दागरहित रहा है।"