स्टीम बॉयलर की मदद से खाना बना रहे किसान
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कृषि कानूनों के विरोध में बीते 18 दिनों से दिल्ली की सीमाओं पर हजारों की संख्या में किसान आंदोलन कर रहे हैं। दिल्ली की कड़कड़ाती ठंड, घना कोहरा, विषैली हवा या प्रशासन की सख्ती... कोई भी बाधा किसानों को टस से मस नहीं कर पाई है। पंजाब-हरियाणा और अन्य जगहों के किसान जब आंदोलन के तहत दिल्ली कूच के लिए निकले थे तो उन्हें अंदाजा नहीं था कि यह विरोध ऐसा रूप ले लेगा। देशभर के लोगों की भूख मिटाने वाले किसान सड़कों पर बैठे हैं और खाना, पीना, रहना, सोना सबकुछ प्रदर्शन स्थल पर ही कर रहे हैं।
शुरूआती दिनों में कुछ दिक्कतों से सीख लेकर किसानों ने अपने लिए ऐसी व्यवस्थाएं की हैं जिनका कोई जवाब नहीं। आईए किसानों की मांगों और प्रदर्शन के कारणों से हटकर एक नजर इसपर डालते हैं कि अन्नदाताओं ने विपरीत समय में अपने खान-पान के लिए क्या और कैसे इंतजाम किए हैं-
चूल्हे पर नहीं बल्कि भाप से पकता है खाना
सिंघु बॉर्डर के प्रदर्शन स्थल पर पहुंचे अमर उजाला के संवाददाता ने गुरदासपुर से आए सरजीत सिंह से बातचीत की। सरजीत के नेतृत्व में ही वहां मौजूद हजारों किसानों का भोजन पकता है। उन्होंने बताया कि वे चूल्हों पर खाना नहीं बनाते, बल्कि भाप तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। वो प्रदशर्नकारी किसानों के लिए लगातार लंगर चला रहे हैं। स्टीम बॉयलर में थोड़ी सी लकड़ी की मदद से भाप पैदा की जाती है, जिसकी मदद से चावल, दाल, सब्जी और अन्य सभी चीजें बनती हैं।
25-30 मिनट में तैयार हो जाता है ढाई-तीन हजार लोगों का खाना
सरजीत सिंह ने बताया कि स्टीम बॉयलर की मदद से खाना जल्दी बनता है। जब उनसे पूछा गया कि वे एक दिन में कितने लोगों का खाना बनाते हैं, तो उन्होंने कहा कि इसकी कोई गिनती नहीं है। उन्होंने बताया कि इस तकनीक से एक पतीले में महज आधे घंटे के अंदर 2500 से 3000 लोगों का खाना बन जाता है।
एक बार में केवल एक पतीले में 40 किलो दाल बन जाती है। यहां तक की अगर मौसम बिगड़ जाता है, तो भी उन्हें कोई समस्या नहीं होगी। आंदोलन के आगे बढ़ने की आशंका को लेकर उन्होंने कहा कि अगर सरकार से बात नहीं बनती है और प्रदर्शन लंबा चलता है, तब भी उन्हें किसी तरह के अतिरिक्त बंदोबस्त की जरूरत नहीं है। उन्होंने आंदोलन के मद्देनजर खाने-पीने के पर्याप्त प्रबंध कर लिए हैं।