1975 में भारत में जब इमरजेंसी लगी तो उस दौरान संजय गांधी पर कई तरह के आरोप लगे थे- कथित तौर पर हुई ज़्यादतियाँ, जबरन नसबंदी, सरकारी काम में दख़ल, मारुति उद्योग विवाद वगैरह- वगैरह। हालांकि इमरजेंसी के बाद जब उनके ख़िलाफ़ क़ानूनी मामले चले तो उन्हें जेल जाना पड़ा एक फ़िल्म के चक्कर में।
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संजय गांधी पर आरोप था कि इमरजेंसी के दौरान 1975 में बनी फ़िल्म 'किस्सा कुर्सी का' के प्रिंट कथित तौर पर उनके कहने पर जलाए गए। ये उन्हीं पर बनाई गई पॉलिटिकल स्पूफ़ फ़िल्म थी। फ़िल्म 'किस्सा कुर्सी का' जनता पार्टी सांसद अमृत नाहटा ने बनाई थी जिसके नेगेटिव ज़ब्त कर लिए गए थे और बाद में कथित तौर पर जला दिए गए। इमरजेंसी के बाद बने शाह कमीशन ने संजय गांधी को इस मामले में दोषी पाया था और कोर्ट ने उन्हें जेल भेज दिया हालांकि बाद में फ़ैसला पलट दिया गया।
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- फोटो : सोशल मीडिया
इसी तरह 1978 में आईएस जौहर की फ़िल्म 'नसबंदी' भी संजय गांधी के नसबंदी कार्यक्रम का स्पूफ़ था जिसमें उस दौर के बड़े सितारों के डुप्लिकेटों ने काम किया था। इसे इत्तेफ़ाक़ कहिए या सोचा समझा क़दम कि ये गाना किशोर कुमार ने गाया था। अंजाम तो सभी जानते हैं कि बाद में किशोर कुमार के गानों पर ऑल इंडिया रेडियो पर बैन लगा दिया गया था।
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शोले पर भी गिरी थी गाज: फ़िल्म शोले के आख़िरी सीन में असल में रमेश सिप्पी ने दिखाया था कि ठाकुर कील लगे जूतों से गब्बर को रौंद देता है। लेकिन वो इमरजेंसी का दौर था और सेंसर बोर्ड के नियम काफ़ी सख़्त थे। वो नहीं चाहता था कि ऐसा कुछ भी दिखाया जाए जिससे लगे कि कि कोई भी क़ानून अपने हाथ में ले सकता है। रिलीज़ की तारीख तय थी -15 अगस्त 1975 और 20 जुलाई हो चुकी थी। संजीव कुमार सोवियत संघ में थे। वे तुरंत भारत लौटे। आख़िरी सीन दोबारा शूट हुआ, डबिंग और मिक्सिंग हुई। सेंसर ने रामलाल का वो सीन भी काट दिया जिसमें वो ज़ोर ज़ोर से ठाकुर के उन जूतों में कील ठोकता है जिससे ठाकुर गब्बर को मारने वाला था- क्योंकि रामलाल आँखों में विद्रोह की झलक थी। इस तरह इमरजेंसी के दौरान शोले तैयार हुई लेकिन ये वो फ़िल्म नहीं थी जो रमेश सिप्पी बनाना चाहते थे।
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- फोटो : सोशल मीडिया
इसी तरह 1978 में आईएस जौहर की फ़िल्म 'नसबंदी' भी संजय गांधी के नसबंदी कार्यक्रम का स्पूफ़ था जिसमें उस दौर के बड़े सितारों के डुप्लिकेटों ने काम किया था। फ़िल्म में दिखाया गया कि किस तरह से नसंबदी के लिए ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को पकड़ा गया। फ़िल्म का एक गाना था 'गांधी तेरे देश में ये कैसा अत्याचार' इसे इत्तेफ़ाक़ कहिए या सोचा समझा क़दम कि ये गाना किशोर कुमार ने गाया था।
नाराज हो देव आनंद ने बनाई थी राजनीतिक पार्टी: इमरजेंसी के दौरान कई कलाकार ऐसे भी थे जो फ़िल्मों के ज़रिए विरोध के अलावा बात आगे तक ले गए। देव आनंद तो इतने नाराज़ थे कि उन्होंने नेशनल पार्टी ऑफ इंडिया नाम की राजनीतिक पार्टी तक बनाई थी। शिवाजी पार्क में इसका बड़ा जलसा भी हुआ। देव आनंद अपनी ऑटोबायोग्राफी में लिखते हैं, "मैं समझ गया था कि मैं उन लोगों के निशाने पर हूँ जो संजय गांधी के क़रीब हैं।"