2009 जून की तपती हुई दोपहर थी। हम अपने परिवार के साथ खेतों में काम कर रहे थे। तभी दस बारह लोग खेतों में आकर कहते हैं कि अभी तक तुम लोग गए नहीं यहां से। हमने और हमारे पति नारायण ने हाथ जोड़कर कहा कि बस कुछ दिन की और मोहलत दे दो। चले जाएंगे, लेकिन उन्होंने हमारी एक नहीं सुनी। हमको मारा पीटा और हमारी दोनों बेटियों को उठा ले गए। उन्हें छोड़ने के लिए हमने बहुत मिन्नतें की, परंतु वह दोनों लड़कियों को ले गए। इतना कहते हुए मजनू का टीला में रहने वाली अस्सी साल की लक्ष्मी की आंखों से आंसू बहने लगते हैं। कहने लगी पता नहीं कहां होंगी हमारी बेटियां। जिंदा भी होंगी या नहीं? ये दर्दनाक आपबीती है 80 वर्षीय लक्ष्मी देवी की, जो अब दिल्ली में एक झोपड़ी में रहती हैं। पाकिस्तान से 2011 में तीर्थयात्रा के बहाने भारत आईं और फिर कभी वापस नहीं गई।