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निर्भया के दोषियों से लेकर गोडसे तक, बक्सर जेल में तैयार हुआ फांसी का फंदा, वजह है खास

Tue, 04 Feb 2020 12:20 PM IST
पूजा त्रिपाठी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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buxar jail - फोटो : सोशल मीडिया
निर्भया केस में पहले 22 जनवरी फिर 1 फरवरी को भी फांसी की तारीख टलने के बाद अब पूरा देश सिर्फ दोषियों की मौत का ही इंतजार कर रहा है। कानूनी तिकड़मों के चलते निर्भया के दरिंदों को फांसी पर लटकाने की तय तारीख एक बार फिर टल गई। दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने बीते शुक्रवार को अगले आदेश तक चारों दोषियों के डेथ वारंट के अमल पर रोक लगा दी। निर्भया के दरिंदों की फांसी भले ही टल गई हो लेकिन तिहाड़ में अब भी फांसी की सारी तैयारियां जारी हैं।

फांसी की तैयारी के लिए सबसे जरूरी होता है फंदा और अगर भारत में बात करें तो यहां गोडसे से लेकर निर्भया के दोषियों तक के फांसी का फंदा एक ही जगह तैयार हुआ है और वो है बिहार की बक्सर जेल। जानिए ऐसी क्या वजह है जो भारत में होने वाली हर फांसी के लिए फंदा बक्सर जेल में ही तैयार होता है.....
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nirbhaya case - फोटो : सोशल मीडिया
बिहार की बक्सर जेल पूरे देश में होने वाली फांसियों के लिए फंदा बनाता है। यहां तक कि नवंबर 1949 में बक्सर जेल ने बापू के हत्यारे नाथूराम गोडसे की फांसी के लिए भी फंदा तैयार किया था। अफजल गुरु से लेकर 1993 बम ब्लास्ट के दोषी याकूब मेमन और 26/11 के दोषी अजमल कसाब तक सभी को बक्सर जेल में बने फंदे से ही फांसी लगी। हालांकि इसका एक खास और अनोखा इतिहास है और इसी वजह सभी फांसियों के लिए फंदे यहीं से बनते हैं।
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buxar jail - फोटो : सोशल मीडिया
दरअसल बक्सर जेल में 1880 से ही फांसी के फंदे बन रहे हैं और यह परंपरा ब्रिटिश शासकों ने शुरू की थी। बक्सर युद्ध में जीत मिलने के बाद जब बंगाल से लेकर उत्तर प्रदेश तक ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना राज्य स्थापित कर लिया था, तब 1880 में ब्रिटिश शासकों ने बक्सर जेल को फांसी का फंदा बनाने का एकाधिकार दिया। 1880 के चार साल बाद 1884 में बक्सर जेल में मशीन लाई गई ताकि फांसी का फंदा तैयार किया जा सके।

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बक्सर जेल में तैयार फांसी के फंदे के लिए रस्सी - फोटो : सोशल मीडिया
इससे पहले फांसी का फंदा फिलीपींस की राजधानी मनीला से मंगाया जाता था, यही कारण है कि फांसी के फंदे को मनीला रस्सी भी बोलते हैं। बाद में इंडिया फैक्टरी एक्ट बनने के बाद इस कानून के तहत बक्सर जेल को फांसी का फंदा बनाने का विशेष अधिकार दे दिया और अन्य लोगों को फंदा बनाने से रोक लगा दी गई।
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buxar jail - फोटो : सोशल मीडिया
फांसी का फंदा बाकी रस्सियों से काफी अलग होता है। यह मुलायम होता है लेकिन फिर भी बहुत मजबूत होता है। अंग्रेजों ने बक्सर जिले को फंदा बनाने का खास अधिकार इसलिए दिया क्योंकि यह गंगा नदी के किनारे है और इसमें एक कुआं भी है जो आज के समय में भी किसी जेल में नहीं है। फांसी का फंदा बनाने के लिए एक खास तरह के धागे J-34 का इस्तेमाल किया जाता है। इस धागे के लिए रुई पंजाब में उगाई जाता थी फिर उसे बक्सर जेल को भेजा जाता था। लेकिन अब सप्लायर बना बनाया धागा जेल भेजता है।
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फांसीघर(फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया
फांसी का फंदा बनाने का एक निश्चित तरीका होता है। यह सिर्फ वही लोग बनाते हैं, जिन्हें यह काम सौंपा जाता है। बक्सर जेल में इस काम के लिए चार-पांच पद होते हैं। यह लोग कैदियों को रस्सियां बनाना सिखाते हैं। इसके लिए जेल के वरिष्ठ कैदियों को चुना जाता है। यह काम मौत की सजा पाए कैदियों को नहीं दिया जाता है।
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विनय ने बनाई ये पेंटिंग - फोटो : अमर उजाला
J-34 के धागों को गुंथ के 154 धागे बनाए जाते हैं। ऐसे छह धागे मिलाकर एक फंदा तैयार किया जाता है। फंदा बनाने के लिए हर स्टेज पर भरपूर मात्रा में पानी का प्रयोग किया जाता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि रस्सी मुलायम बने। फांसी लगाने का नियम है कि फंदे से दोषी मरना चाहिए लेकिन उसके गर्दन पर रस्सी से किसी तरह की चोट नहीं आनी चाहिए। यह पोस्टमार्टम में सुनिश्चित किया जाता है। यह जानना दिलचस्प होगा कि एक ही फंदे से कई फांसी दी जा सकती है लेकिन भारत में फांसी बहुत कम होती है तो ऐसा नहीं होता। बता दें कि पिछले 20 सालों में सिर्फ चार दोषियों को फांसी पर लटकाया गया है।
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