वसंतकुंज इलाके में 16 दिसंबर 2012 की रात निर्भया के साथ हुई दरिंदगी के मामले में ट्रायल कोर्ट ने घटना के करीब नौ महीने बाद चार आरोपियों को दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुना दी थी, लेकिन इसके बाद मामला हाईकोर्ट में पहुंचा था। हाईकोर्ट ने भी पांच महीनों तक चली सुनवाई के बाद दोषियों को फांसी की सजा बरकरार रखी। मामले के सुप्रीम कोर्ट में पहुंचने के बाद दोषियों की फांसी की सजा बरकरार रखने में काफी समय बीता और जब फांसी की सजा सुनाई गई तो दोषियों ने रिव्यू पिटीशन दायर कर केस को और लंबा खींच दिया।
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ट्रायल कोर्ट ने कब-कब की थी सुनवाई
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nirbhaya case
- फोटो : अमर उजाला
16 दिसंबर 2012 को निर्भया के साथ हुई दरिंदगी को लेकर दिल्ली पुलिस ने एक्शन लिया। 3 जनवरी 2013 को दिल्ली पुलिस ने रामसिंह, विनय, अक्षय, पवन और मुकेश व एक नाबालिग के खिलाफ सामूहिक दुष्कर्म, हत्या की कोशिश, अगवा करने, लूट और अप्राकृतिक कृत्य करने का दोषी ठहराते हुए आरोपपत्र दायर किया था।
28 जनवरी 2013 को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने फैसला सुनाया कि इस अपराध का छठा आरोपी जुवेनाइल है।
2 फरवरी 2013 को बाकी पांचों अपराधियों के खिलाफ हत्या समेत 13 मामलों में आरोप पत्र दायर किया गया।
11 मार्च 2013 को तिहाड़ जेल में बंद दोषियों में से एक राम सिंह ने फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली।
21 मार्च 2013 को दुष्कर्म से जुड़े कानून में बदलाव किया गया। नया एंटी रेप लॉ बना, जिसके तहत बार-बार ऐसे अपराध करने वाले के लिए मौत की सजा तय की गई।
31 अगस्त 2013 को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने नाबालिग अपराधी को सामूहिक दुष्कर्म औ हत्या के लिए 3 साल की अधिकतम सजा सुनाते हुए सुधार गृह भेज दिया।
13 सितंबर 2013 को फास्ट ट्रैक कोर्ट ने चार दोषियों को मौत की सजा सुनाई और ट्रायल कोर्ट ने फिर केस पर मुहर लगने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट के पास भेज दिया।
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पांच महीनों में हाईकोर्ट ने भी सुनाई थी मौत की सजा
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निर्भया के दोषी
- फोटो : अमर उजाला
ट्रायल कोर्ट के बाद जब केस हाईकोर्ट में पहुंचा तो एक नवंबर 2013 को हाईकोर्ट ने निर्भया केस में सुनवाई शुरू की। पांच महीनों तक चली सुनवाई के बाद 13 मार्च 2014 को चारों की फांसी की सजा बरकरार रखने का फैसला सुना दिया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
20 दिसंबर को नाबालिग आरोपी रिहा
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इसी बस में हुई थी हैवानियत
- फोटो : अमर उजाला
सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान नाबालिग दोषी की सजा पूरी होने के चलते 20 दिसंबर 2015 को उसे रिहा कर दिया। इस फैसले को लेकर देशभर में काफी विरोध हुआ था, लेकिन नाबालिग की रिहाई पर रोक लगाने के लिए हाईकोर्ट ने इंकार कर दिया था, जिसके चलते बाल सुधार गृह ने उसे रिहा कर दिया था।
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सुप्रीम कोर्ट में लंबी चली सुनवाई
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ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट से करीब साढ़े तीन साल बाद मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा। 3 अप्रैल 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई शुरू की। करीब एक साल बाद 25 मार्च 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रखा और 5 मई 2017 को अक्षय ठाकुर, विनय शर्मा, पवन गुप्ता और मुकेश सिंह की फांसी की सजा को बरकरार रखा।
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9 जुलाई को दायर हुई रिव्यू पिटीशन
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : social media
सुप्रीम कोर्ट से मौत की सजा बरकरार रखे जाने के बाद निर्भया के दोषियों पवन, मुकेश और विनय की ओर से रिव्यू पिटीशन सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 9 जुलाई 2018 को खारिज कर दिया। रिव्यू पिटीशन पर फैसला आने में भी करीब एक साल से ज्यादा का समय बीत गया।
निर्भया की मां डेथ वारंट पर अमल के लिए पहुंची पटियाला हाउस कोर्ट
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- फोटो : अमर उजाला
दोषियों को फांसी की सजा देने पर अमल के लिए 13 दिसंबर 2018 को निर्भया की मां ने फिर से ट्रायल कोर्ट (पटियाला हाउस) का दरवाजा खटखटाया। दोषियों के डेथ वारंट पर सबसे पहले जज अनु ग्रोवर ने सुनवाई की, लेकिन उनका ट्रांसफर होने के कारण सुनवाई दूसरे जज पीके जैन के पास चली गई, लेकिन उनका भी ट्रांसफर होने के बाद सुनवाई तीसरे जज के पास चली गई। इसके बाद जज के छुट्टी पर रहने के कारण जिला अदालत में जज बदलने की याचिका दायर की। मामले की सुनवाई न्यायाधीश सतीश कुमार अरोड़ा के पास पहुंची। ट्रायल कोर्ट सुप्रीम कोर्ट में दोषियों की रिव्यू पिटीशन लंबित होने के कारण पहले कोई फैसला नहीं सुना पाई। जब दोषियों की सभी याचिकाएं खारिज हो गईं, तब 7 जनवरी को ट्रायल कोर्ट ने दोषियों के डेथ वारंट जारी करते हुए 22 जनवरी की सुबह 7 बजे फांसी देने का फैसला सुनाया।