निर्भया के दोषियों को फांसी देने की प्रक्रिया में आई तेजी के बाद से उसके माता-पिता में एक आस जगी है कि अब जल्द ही उनकी बेटी को न्याय मिलेगा। इस बीच कई ऐसी खबरें आ रही हैं कि फांसी की क्या प्रक्रिया है और कैसे एक शख्स को फांसी पर लटकाने के कई घंटे बाद भी वह जिंदा बच सकता है। दरअसल आज से 37 साल पहले ऐसा हो भी चुका है और वो भी तिहाड़ जेल में ही हुआ था।
दरअसल एक शख्स को फांसी दी गई लेकिन दो घंटे बाद भी उसकी नाड़ी चल रही थी तब उसकी जान लेने के लिए कुछ ऐसा किया गया था, जानिए कौन है वह शख्स और क्या है पूरी कहानी...
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रंगा बिल्ला
- फोटो : Social Media
मेडिकल साइंस का हवाला देते हुए तिहाड़ जेल के वरिष्ठ डॉक्टर के अलावा वास्तविकता में भी शरीर का वजन कम होने से 2 घंटे बाद भी मौत नहीं होने का किस्सा हो चुका है। ये घटना हुई थी 31 जनवरी 1982 को। कुख्यात हत्यारे रंगा और बिल्ला को इसी दिन फांसी गई थी।
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रंगा बिल्ला
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तिहाड़ जेल के पूर्व प्रवक्ता सुनील गुप्ता की किताब ब्लैक वॉरेंट में ये पूरा किस्सा लिखा है। इस किताब के अनुसार फांसी में हर चीज ब्लैक होती है। ब्लैक कपड़े, ब्लैक वॉरेंट, ब्लैक थैला (सिर पर डालने वाला) इत्यादि।
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रंगा बिल्ला
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31 जनवरी 1982 को सुबह 5 बजे रंगा ने स्नान किया था बिल्ला ने नहीं। तत्कालीन जेल अधीक्षक आर्य भूषण शुक्ल ने लाल रूमाल हिलाया तो जल्लाद ने लीवर खींच दिया। 2 घंटे बाद जब डॉक्टरों ने जांच की तो बिल्ला मृत पाया गया, लेकिन रंगा की नाड़ी तब तक चल रही थी।
सांस रोकने या शरीर का वजन कम होने से ऐसा हो सकता है। जब रंगा में सांस चल रही थी तो उसके पैरों को दोबारा से नीचे जाकर खींचा गया था। किताब में लेखक ने दावा किया है कि उस वक्त वे वहां मौजूद थे।