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मिलिए उस शख्स से जो साइकिल चला पत्नी को मिलने पहुंचा स्वीडन

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इस शख्स का नाम है प्रद्युम्न कुमार महानंदिया। ये वो शख्स है जिसने प्यार के लिए वो काम कर दिखाया जिसके बारे में किसी के लिए भी सोचना बहुत मुश्किल है।
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प्रद्युम्न अपने प्यार यानी अपनी प्यारी पत्नी से मिलने के लिए दिल्ली से साइकिल चलाकर स्वीडन गए।
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ये वो दौर है जब आए दिन हमें लोगों के रिश्ते टूटते नजर आते हैं वहीं प्रद्युम्न का प्यार हम सबके लिए प्रेरणास्रोत है।

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बता दें कि प्रद्युम्न किसी बड़े घर में नहीं बल्कि उड़ीसा में 1949 में शूद्र परिवार में जन्मे थे। उनके लिए तो विदेश जाने की बात सोचना भी बहुत दूर की कौड़ी थी। लोग अक्सर ही उन्हें और उनके परिवार को जलील किया करते थे।
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1971 में उन्होंने कॉलेज ऑफ आर्ट्स में दाखिला लिया था। उनकी पोट्रेट बनाने की प्रतिभा इतनी विख्यात हुई कि वो लंदन तक जा पहुंची। और ये बात शेरलॉट वॉन स्केडविन को भी पता चली और वो अपना पोट्रेट बनवाने भारत आ पहुंची।
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शेरलॉट का पोट्रेट बनाते वक्त प्रद्युम्न को उससे प्यार हो गया और शेरलॉट ने भी ऐसा ही महसूस किया। शेरलॉट ने अपना नाम बदलकर चारुलता रख लिया। जब वो स्वीडेन वापस जाने लगी तो उसने प्रद्युम्न से भी चलने को कहा पर वो पढ़ रहा था इसलिए उसने मना कर दिया।
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चारुलता ने उनके लिए एयर टिकट भी भेजा लेकिन उन्होंने वादा किया कि वो अपने बूते स्वीडन आएंगे।

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जब तक वो दोनों नहीं मिले तब तक दोनों पत्रों से एक-दूसरे का हाल-चाल जानते रहे।

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पढ़ाई पूरी करने के बाद उसने अपनी पत्नी से मिलने के लिए अपनी सारी चीजें बेच दीं और एक सेकन्ड हैंड साइकिल खरीदी। इसके बाद 1978 में उसने अपनी एक बहुत ही महान यात्रा शुरू की। प्रद्युम्न ने दिल्ली से यात्रा शुरू करते हुए अमृतसर, अफगानिस्तान, ईरान, तुर्की, बुल्गारिया, युगोस्लाविया, जर्मनी, ऑस्ट्रिया और डेनमार्क होते हुए स्वीडन पहुंचा।
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अपनी चार महीने 3 हफ्ते की यात्रा पूरी कर जब वो स्वीडन पहुंचा तो वहां के इमिग्रेशन अधिकारी भी उसके स्वीडन आने की वजह सुनकर चौंक गए। जब चारुलता ने ये बात सुनी तो वो स्वीडेन के गोथेनबर्ग पहुंची और अपने पति की इस बात पर वह प्यार किए बिना नहीं रह पाई। उसके माता-पिता ने प्रद्युम्न को स्वीकार कर लिया। इनकी शादी को 40 साल हो गए हैं और इनके दो बच्चे हैं। प्रद्युम्न स्वीडेन में भारत की ओर से ओरिया संस्कृति का राजदूत भी है।
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