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दिल्ली में ये काम होते ही आधी जंग हार गई थी आप, कहीं साबित न हो ताबूत की आखिरी कील

Fri, 24 May 2019 12:46 PM IST
पूजा त्रिपाठी संतोष कुमार, अमर उजाला, नई दिल्ली
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आप कार्यालय के बाहर पसरा सन्नाटा और भाजपा कार्यालय के बाहर मनता जश्न - फोटो : अमर उजाला
आम आदमी पार्टी (आप) का पूर्ण राज्य का मुद्दा दिल्ली में रंग नहीं दिखा सका। अरविंद केजरीवाल की प्रधानमंत्री चुनने की जगह दिल्ली के हक में वोट करने की अपील भी दिल्लीवालों ने अनुसनी की। आम आदमी पार्टी के हार की बड़ी वजह दिल्ली में हुआ एक काम माना जा रहा है, जो पूरी पार्टी के लिए ही ताबूत की आखिरी कील साबित हो सकता है।
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आप कार्यालय में पसरा सन्नाटा - फोटो : अमर उजाला
दरअसल कांग्रेस से गठबंधन की हवा निकलते ही दिल्ली में आप धड़ाम हो गई थी। जमीन पर काम कर रहे कार्यकर्ता उसी वक्त आधी लड़ाई हार गए थे। नतीजतन करारी शिकस्त के साथ आप के वोट प्रतिशत में बड़े पैमाने पर गिरावट आई है। दरअसल, प्रचार अभियान के मामले में आप ने भाजपा व कांग्रेस पर फरवरी 2019 तक बढ़त बनाए हुई थी,  लेकिन इसी दौरान कांग्रेस के साथ गठबंधन की सियासी चर्चाओं का बाजार गरम हो गया। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपनी चुनावी सभाओं में कहने लगे कि गठबंधन होने से दिल्ली में भाजपा को हराना आसान होगा। मुकाबला त्रिकोणीय हुआ तो भाजपा विरोधी वोटों के बंटवारे से परिणाम भाजपा के हक में जा सकता है। इससे कार्यकताओं में मैसेज चला गया कि गठबंधन ही भाजपा को हराने का अहम जरिया हो सकता है। इसके बाद गठबंधन को लेकर सरगर्मी बढ़ती गई।
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- फोटो : अमर उजाला
नामांकन के आखिरी दिन तक 23 अप्रैल तक कोशिशें चलती रहीं। आप के सभी प्रत्याशियों में आशंका घर कर गई थी कि कहीं उनकी सीट ही गठबंधन के हवाले न आ जाए। लेकिन गठबंधन की कोशिश नाकामयाब होने से जमीन पर काम कर रहे आप कार्यकर्ता आधी सियासी जंग हार गए। अपने संयोजक अरविंद केजरीवाल के दुबारा से यकीन दिलाने के बाद भी कार्यकर्ता दिल से जीत पक्की नहीं मानने को तैयार नहीं हुआ। आखिरी वक्त में पार्टी की सारी रणनीति धरी रह गई और आप दिल्ली में तीसरे नंबर पर खिसक गई। दूसरी तरफ केजरीवाल दिल्लीवालों को यह नहीं समझा सके कि केंद्र में सरकार बनाने के लिए हो रहे चुनाव में उनको वोट देना किस तरह फायदेमंद रहेगा।

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साख पर धक्का लगना भी पड़ा आप पर भारी
2015 के विधान सभा चुनाव में आप के खाते में 67 सीटें जाने की बड़ी वजह भ्रष्टाचार के खिलाफ पार्टी की लड़ाई थी। अरविंद केजरीवाल की साख ईमानदार व तेज-तर्रार नेता की थी, लेकिन बीते साढ़े चार सालों में आप के साथ विश्वसनीयता का संकट पैदा हो गया। एक तो पार्टी को पंजाब विधान सभा चुनाव व दिल्ली के एमसीडी चुनाव में करारी शिकस्त मिली। वहीं, भाजपा विरोध में अरविंद केजरीवाल उन्हीं नेताओं के साथ खड़े नजर आए, जिनके खिलाफ उन्होंने भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े आरोप लगाए थे। इससे लोगों में 2015 जैसी सुहानुभूति नहीं रही।
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आप के सामने दिल्लीवालों का विश्वास कायम करना बड़ी चुनौती
करारी शिकस्त के बाद भी आप के भीतर नेताओं में विरोध की संभावना बेहद कम है, लेकिन अब पार्टी के सामने अगले छह महीने में दिल्लीवालों का विश्वास दुबारा से बनाने की बड़ी चुनौती है। खासतौर से इसलिए भी कि दिल्ली में वह तीसरे नंबर की पार्टी हो गई है। 2015 के चुनाव से पहले केजरीवाल ने दिल्ली की गली-गली घूमकर लोगों से 49 दिन की सरकार से इस्तीफा देने के लिए माफी मांगी थी, लेकिन इस बार केजरीवाल के पास इस तरह की किसी रणनीति पर काम करने के विकल्प सीमित हैं। 
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