देश की राजधानी दिल्ली अपने दामन में इतिहास की ऐसी विरासत को समेटे हुए है जिसे जाने बिना इस शहर और इसकी गंगा-जमुनी तहजीब को समझना मुश्किल है। इस खास पेशकश में हम आपको दिल्ली पर लगभग तीन सौ साल तक राज करने वाले मुगल शासकों और उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ तथ्य परक और रोचक किस्सों से रूबरु करा रहे हैं...तो आइए जानते हैं महमूद गजनवी का हिंदुओं के प्रति व्यवहार और उस पर मुसलमानों की प्रतिक्रिया।
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जानिए हिंदूओं पर सितम के बाद गजनवी से क्यों गुस्सा थे मुसलमान
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महमूद गजनवी के समय गजनवी सेना की मुहिम के चलते मन्दिरों का जो निर्मम विध्वंस हुआ, उसे कोई भी ईमानदार इतिहासकार छिपाना नहीं चाहेगा और अपने दीन को जानने वाला कोई मुसलमान उचित ठहराने की कोशिश नहीं करेगा।
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समकालीन और बाद के इतिहास इन घिनौने कार्यों पर पर्दा डालने की कोशिश नहीं करते बल्कि फख्र से उनका बखान करते हैं। अपने जमीर की तोड़ मरोड़ करना आसान होता है और हमें बखूबी पता है कि लोग जो कुछ दुनियावी प्रेरणाओं से करना चाहते हैं उसका धार्मिक औचित्य ढूंढ निकालना कितना आसान होता है।
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शरियत को कोई भी ज्ञात सिद्धान्त उन हिन्दू राजाओं पर गैर-जरूरी हमलों को उचित नहीं ठहराता, जिन्होंने महमूद और उसकी प्रजा को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया था, हर मसलक का कायदा पूजा स्थानों के निर्मम विध्वंस की निंदा करता है।
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लेकिन फिर भी जो कुछ किया गया था आगे उसका औचित्य गढ़ने के लिए इस्लाम का इस्तेमाल किया गया। हालांकि इस्लाम उसका प्रेरक तत्व था भी नहीं। गैर-मुसलमान आबादियों की तबाही को इस्लाम की खिदमत ठहराना कोई मुश्किल काम नहीं था।
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अरब में पैगम्बर ने इस्लाम का उपदेश इस रूप में नहीं किया था और किसी को इस बात पर हैरानी नहीं होनी चाहिए कि विजयी गजनवियों के तौर तरीकों ने हिन्दू मानस में इस नए धर्म के प्रति ज्वलंत घृणा को जन्म दिया और सेनाओं और गढ़ियों से भी अधिक कारगर ढ़ंग से उसकी प्रगति को रोका।
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वे आए, जलाया, कत्ल किए, लूटपाट की, गिरफ्तारियां की और चले गए। गहरी निगाह वाले अलबैरूनी लिखते हैं कि महमूद ने इस देश की सुख समृद्धि को पूरी तरह नष्ट कर दिया और ऐसे कारनामों को अंजाम दिया, जिनके कारण हिंदू सभी दिशाओं में फैली हुई धूल के कणों के समान हो गए।
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या यूं कहें कि जनता के मूह से निकलती किसी पुरानी कहानी जैसे हो गए। उनके बिखरे हुए लोग निश्चित ही तमाम मुसलमानों के प्रति बेहद गहरी नफरत से भरे हुए हैं। शायद यही इसका कारण भी है कि हिंदू ज्ञान-विज्ञान में देश में हमारे जीते हुए इलाकों से काफी दूर चले गए और ऐसे दूरदराज के इलाकों में पहुंच गए। जहां अभी तक हमारे हाथ आसान से नहीं पहुंचते- कश्मीर, बनारस और दूसरे स्थानों पर।
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फिर यह भी उनके और तमाम विदेशियों की दुश्मनी को राजनीतिक, धार्मिक और अन्य कारणों से अधिकारिक खुराक मिलती है। लोगों की बुराई उनके बाद भी जिन्दा रहती है, उनके भले काम अक्सर उनकी हड्डियों के साथ दफन हो जाते हैं।
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महमूद का कारनामा चाहे जो भी रहा हो, हिंदू पुरूत्थान ने उसे उसकी मौत के बाद धोकर रख दिया है। जिन्होंने तलवार उठाई वे तलवार से ही तबाह हुए। लाहौर के पूरब में मुसलमानों की कोई निशानी नहीं बची और महमूद की जीतों ने जो हिंदू धर्म के नैतिक विश्वास को झकझोरने में नाकाम रही, उसके धर्म पर हमेशा के लिए एक धब्बा लगा दिया। नोट- उक्त विवरण इरफान हबीब की पुस्तक 'मध्यकालीन भारत'
(श्रृंख्ाला-10) के 'महमूद गजनवी इतिहास में' अध्याय
पर आधारित है।