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ये है एक ऐसा अस्पताल जहां 13 देशभक्तों को दी गई थी फांसी, यहां दफ्न हैं कई और राज

Tue, 16 Jan 2018 10:43 AM IST
परीक्षित निर्भय/अमर उजाला, नई दिल्ली
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mamc - फोटो : अमर उजाला
क्या आपने किसी ऐसे अस्पताल के बारे में सुना है, जिसके शुरू होने से पहले अंग्रेजों के जमाने में देश के कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को सूली पर चढ़ाया गया हो।
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mamc - फोटो : अमर उजाला
देश के शीर्ष मेडिकल कॉलेजों में से एक मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज का यही इतिहास है। दिल्ली गेट स्थित इस कॉलेज के परिसर में साल 1945 तक फांसी दी जाती थी। आजादी के बाद कॉलेज बना तो इस जगह का नाम फांसी घर रख दिया गया, जो आज भी वही है। कॉलेज में आने वाले भावी डॉक्टरों को शपथ लाने से पहले शहीदों की कुर्बानियों के बारे में बताया जाता है। 
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mamc - फोटो : अमर उजाला
दरअसल, वर्ष 1930 में ब्रिटिश शासक लॉर्ड इरविन की देखरेख में दिल्ली गेट पर एक अस्पताल (एलएनजेपी) की नींव रखी गई थी। करीब छह साल बाद यह अस्पताल बनकर तैयार हुआ। उस वक्त अस्पताल की चारदीवारी सेंट्रल जेल का ही हिस्सा थी। यहां 1915 से 1945 के बीच 13 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को फांसी पर लटकाया गया। हालांकि साक्ष्य बताते हैं कि फांसी का आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा था। जहां सेंट्रल जेल थी, वहां आजादी के करीब नौ वर्ष बाद साल 1956 में मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज की स्थापना हुई।

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लॉर्ड हार्डिंग बम कांड में फांसी
साल 1912 में दिल्ली में हुए लॉर्ड हार्डिंग बम कांड में 8 मई 1915 को मास्टर अमीर चंद, भाई बालमुकुंद, मास्टर अवध बिहारी को यहां फांसी दी गई। 31 मार्च 1916 को हवलदार जलेश्वर सिंह को सजा-ए-मौत दी गई। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के सदस्य मंसा सिंह को 6 अप्रैल 1931 और संपादक अलामन हत्या प्रकरण में शफीक अहमद को 20 मई 1940 को सूली पर चढ़ाया गया। इसके अलावा, शत्रु अभिकर्ता अधिनियम (आईएनए) के अंतर्गत छत्तर सिंह, नजर सिंह, अजायब सिंह, सतेंद्र नाथ मजूमदार, जहूर अहमद और दरोगा मल को वर्ष 1944 फांसी दी गई। केशरीचंद्र शर्मा को 3 मई 1945 को सरेआम फांसी दी गई थी। 
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ब्रिटेन से आईं दुर्लभ तस्वीरें
कॉलेज प्रबंधन के अनुसार, सर्जरी विभाग के अध्यक्ष रहे डॉ. विजय के अथक प्रयास से फांसीघर की दुर्लभ तस्वीरों को यूके स्थित ब्रिटिश पुरातत्व विभाग से भारत लाया गया था। डॉ. विजय के निधन के बाद इन तस्वीरों को लेकर कॉलेज की ओर से किताब भी बनाई गई है। जीबी पंत अस्पताल के न्यूरो सर्जरी विभाग के डॉ. दलजीत सिंह भी इसका हिस्सा रहे हैं। 
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समय बदला, नाम भी बदले
लॉर्ड इरविन द्वारा स्थापना के बाद से अब तक समय के साथ तीन बार अस्पताल का नाम बदला जा चुका है। इमरजेंसी के बाद बनी सरकार के दौरान इस अस्पताल का नाम बदलकर लोक नायक जयप्रकाश नारायण (एलएनजेपीएन) अस्पताल रखा गया। वर्ष 1998 में नाम को छोटा कर लोकनायक अस्पताल कर दिया गया। 
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एक ही परिसर में चार संस्थान
फांसीघर के आसपास एक ही परिसर में चार चिकित्सीय संस्थान इस वक्त मौजूद हैं। इनमें मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज, मौलाना आजाद डेंटल कॉलेज, जीबी पंत सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल और एलएनजेपी अस्पताल हैं। 
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एम्स
...तो यहां बनता एम्स
देश के सबसे बड़े चिकित्सीय संस्थान एम्स को इसी फांसीघर के आसपास बनाए जाने की तैयारी थी। उस वक्त सरकार ने इस पर सहमति भी जताई थी। बाद में किन्हीं कारणों से अंसारी नगर में एम्स और यहां मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज की स्थापना एक ही वर्ष 1956 में की गई थी। 
आम शैक्षिक संस्थानों की तुलना में हमारा कॉलेज इसलिए ज्यादा महत्व रखता है, क्योंकि इससे देश का इतिहास जुड़ा है। हमारे यहां हर वर्ष एमबीबीएस का नया बैच आता है तो सबसे पहले उन्हें इससे रूबरू कराया जाता है।- डॉ. सिद्घार्थ रामजी, डीन, मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज।
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