हरीश राणा की दर्दनाक कहानी का अंत हो गया। गाजियाबाद निवासी हरीश के पिता ने इलाज कराने के लिए अपना घर बेच दिया, दर-दर भटके पर भी आखिर तक उम्मीद नहीं छोड़ी। सैंडविच बेचकर उसका इलाज चलता रहा। 13 साल तक बेटे की सांसों से परिवार की दुनिया बंधी रही।
हरीश राणा की कहानी दर्द और संघर्ष की ऐसी दास्तान है, जिसमें पिता अशोक राणा का त्याग, मां निर्मला की प्रार्थना और बेटे की मौन पीड़ा एक साथ दिखाई देते हैं। यह केवल बीमारी नहीं, बल्कि उस जिद की भी कहानी है, जिसमें परिवार ने आखिर तक उम्मीद नहीं छोड़ी। इसके लिए उन्हें अपनी सारी जमा पूंजी खर्च करने के साथ घर ही क्यों न बेचना पड़ा हो।
वर्ष 2013 में हुए हादसे के बाद हरीश कोमा में चले गए और उसी दिन से परिवार का जीवन एक अंतहीन संघर्ष में बदल गया। डॉक्टरों के पास उम्मीद थी तो माता-पिता के पास विश्वास।
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बेटे हरीश के साथ माता-पिता
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
यही विश्वास उन्हें चंडीगढ़ के पीजीआई से लेकर दिल्ली के बड़े अस्पतालों एम्स, लोक नायक, राम मनोहर लोहिया, अपोलो और फोर्टिस तक बार-बार ले जाता रहा। हर बार नई उम्मीद जागती, लेकिन धीरे-धीरे टूट जाती। इसके बावजूद पिता के मन में बेटे के ठीक होने की आस कभी खत्म नहीं हुई।
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हरीश के पिता
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
तीन मंजिला घर बेच दिया
बेटे के ठीक होने की उम्मीद में अशोक राणा ने दिल्ली में अपना तीन मंजिला घर तक बेच दिया। इसके बाद परिवार राजनगर एक्सटेंशन की राज एंपायर सोसायटी में रहने लगा। जीवनयापन के लिए उन्होंने सैंडविच बेचना शुरू किया। एक समय अपने घर के मालिक रहे अशोक राणा अब सड़क किनारे खड़े होकर रोजी कमा रहे थे, लेकिन उनकी एक ही इच्छा थी कि बेटा एक दिन फिर से आंखें खोले और खड़ा हो सके।
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बेटे हरीश के साथ पिता
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
इलाज ने तोड़ी आर्थिक कमर
समय के साथ परिवार की आर्थिक स्थिति लगातार बिगड़ती गई। अशोक राणा की पेंशन मात्र साढ़े तीन हजार रुपये है, जो पर्याप्त नहीं थी। छोटे बेटे आशीष की नौकरी से कुछ सहारा मिला, लेकिन खर्च इतने अधिक थे कि हर दिन नई चिंता सामने खड़ी हो जाती।
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बेटे हरीश के साथ मां
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
हरीश के इलाज पर हर महीने 40 से 50 हजार रुपये तक खर्च होता था, जबकि एक नर्स का वेतन ही 27 हजार रुपये था। इन सबके बीच सबसे भारी था वह मानसिक दर्द, जिसे माता-पिता हर दिन सह रहे थे।
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हरीश राणा के पिता
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
अपने बेटे को निश्चल अवस्था में बिस्तर पर पड़े देखना उनके लिए सबसे बड़ी पीड़ा थी। वह न बोल सकता था, न अपनी बात कह सकता था, सिर्फ मशीनों के सहारे उसकी सांसें चल रही थीं।
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हरीश राणा के पिता
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
समर्पण की मिसाल बने पिता
सोसायटी निवासी सचिन शर्मा ने इसे एक पिता के समर्पण की मिसाल बताया। उन्होंने कहा कि हरीश के पिता ने अपने बेटे के लिए जो कुछ किया, वह असाधारण है। अंतिम समय तक उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी और हर संभव प्रयास किया। उन्होंने यह भी कहा कि नवरात्र के दौरान हरीश का जाना इस घटना को और अधिक भावुक बना देता है।
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हरीश राणा की फाइल फोटो
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
अंतिम विदाई की तैयारी
स्थानीय निवासी राजकुमार ने बताया कि हरीश का अंतिम संस्कार दक्षिण दिल्ली के ग्रीन पार्क में किया जाएगा। परिवार के रिश्तेदार और परिचित वहां पहुंच चुके हैं, जबकि सोसायटी से भी बड़ी संख्या में लोग अंतिम विदाई देने जाएंगे। उन्होंने कहा कि जीवन का सबसे बड़ा दुख तब आता है, जब पिता को बेटे की अर्थी को कंधा देना पड़ता है। इस कठिन घड़ी में पूरी सोसायटी परिवार के साथ खड़ी है।
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हरीश राणा के पिता
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
यह है मामला
जुलाई 2010 में हरीश ने चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग में दाखिला लिया था। वर्ष 2013 में वह अंतिम वर्ष के छात्र थे। इसी दौरान अगस्त 2013 में रक्षाबंधन वाले दिन बहन से मोबाइल फोन पर बात करते हुए पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए थे।
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हरीश राणा और उसके पिता
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
गंभीर रूप से घायल हरीश को तुरंत पीजीआई चंडीगढ़ में भर्ती कराया गया। बाद में दिसंबर 2013 में उसे दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों ने बताया कि वह क्वाड्रिप्लेजिया से ग्रसित है। इस स्थिति में उसके हाथ-पैर पूरी तरह निष्क्रिय हो गए और वह जीवन भर बिस्तर पर रहने को मजबूर हो गए।
हरीश के असहनीय दर्द और शारीरिक अक्षमता के कारण माता-पिता ने दिल्ली हाईकोर्ट में इच्छामृत्यु की अपील की, जिसे 8 जुलाई 2025 को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। इसके बाद परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। करीब आठ महीने बाद 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने हरीश को इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति दे दी थी।