सुप्रीम कोर्ट ने एक असाधारण फैसला सुनाते हुए 13 साल से कोमा में रह रहे हरीश राणा को पैसिव इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी है। यह निर्णय भारत में 'मानव गरिमा के साथ मरने के अधिकार' की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। कोर्ट ने यह फैसला 2018 के 'कॉमन कॉज' मामले में दिए गए अपने ऐतिहासिक निर्णय और 2023 में जारी किए गए संशोधित दिशानिर्देशों के आधार पर सुनाया है। आइए जानते हैं हरीश के परिवार के 13 साल के संघर्ष की कहानी।
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हरीश राणा की फाइल फोटो
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
उम्र ढल रही है और माता-पिता को यह डर सता रहा है कि वे हमेशा अपने बेटे के साथ नहीं रह पाएंगे। ऐसे में बेटे के लिए इच्छा मृत्यु की मांग करना उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन हर दिन उसे इस हालत में देखना भी उनके लिए बेहद पीड़ादायक है।
माता-पिता चाहते हैं कि इच्छा मृत्यु की अनुमति मिलने के बाद हरीश के शरीर के जो अंग काम कर रहे हैं, उन्हें दान कर दिया जाए ताकि दूसरों को नया जीवन मिल सके। यह मार्मिक बातें हरीश के पिता अशोक राणा ने सुप्रीम कोर्ट से बेटे की इच्छा मृत्यु की अनुमति मिलने के बाद कहीं।
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हरीश राणा के पिता
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
राजनगर एक्सटेंशन स्थित राज अंपायर में रहने वाले 31 वर्षीय हरीश राणा पिछले करीब 13 साल से बिस्तर पर हैं। उनकी सांसें तो चल रही हैं, लेकिन शरीर पूरी तरह निष्क्रिय हो चुका है। वह क्वाड्रिप्लेजिया बीमारी से पीड़ित हैं और 100 प्रतिशत दिव्यांग हो चुके हैं।
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हरीश राणा और उसके पिता
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
हरीश की मां निर्मला देवी ने बेटे की इच्छा मृत्यु की अनुमति के लिए पहले हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, लेकिन 8 जुलाई को अदालत ने उनकी अपील खारिज कर दी। इसके बाद परिजनों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
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हरीश राणा के पिता
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
पीजी की चौथी मंजिल से गिरे थे हरीश
पिता अशोक राणा ने बताया कि वर्ष 2013 में रक्षाबंधन के दिन हरीश पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए थे। इस हादसे में उनके सिर और कमर में गंभीर चोट आई थी। उस समय परिवार को उम्मीद थी कि इलाज के बाद वह ठीक हो जाएंगे, लेकिन हादसे के बाद से वह बिस्तर से उठ नहीं पाए।
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हरीश राणा के पिता
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
परिजन पिछले 13 वर्षों से हरीश के इलाज और देखभाल में लगे हुए हैं। उनका इलाज पीजीआई चंडीगढ़, एम्स, आरएमएल, एलएनजेपी और अपोलो सहित कई बड़े अस्पतालों में कराया गया, लेकिन कोई खास सुधार नहीं हो सका।
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हरीश राणा का फ्लैट
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
इलाज कराने में बेच दिया मकान
अशोक राणा ने बताया कि इलाज के लिए उन्होंने सितंबर 2021 में दिल्ली के महावीर एंक्लेव स्थित अपना तीन मंजिला मकान भी बेच दिया। अब परिवार की आर्थिक स्थिति भी कमजोर हो चुकी है और आगे इलाज कराना उनके लिए संभव नहीं रह गया है। ऐसे में वे बेटे को इस पीड़ा से मुक्ति दिलाने और उसके अंगों के माध्यम से दूसरों को जीवन देने की इच्छा रखते हैं।
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सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को इच्छामृत्यु की दी इजाजत
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
क्वाड्रिप्लेजिया: एक गंभीर तंत्रिका संबंधी विकार
क्वाड्रिप्लेजिया, जिसे टेट्राप्लेजिया के नाम से भी जाना जाता है, एक अत्यंत गंभीर तंत्रिका संबंधी स्थिति है। इसमें व्यक्ति के शरीर के चार प्रमुख अंग - दोनों हाथ और दोनों पैर - लकवाग्रस्त हो जाते हैं, जिससे उनकी गतिशीलता और कार्यक्षमता पर गहरा असर पड़ता है। यह स्थिति मुख्य रूप से रीढ़ की हड्डी में, विशेषकर गर्दन के क्षेत्र में, गंभीर चोट लगने या किसी बीमारी के कारण उत्पन्न होती है।
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सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को इच्छामृत्यु की दी इजाजत
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
सुप्रीम कोर्ट का फैसला- हरीश को इच्छामृत्यु की इजाजत
हरीश के स्वास्थ्य में सुधार न देखते हुए आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति दी। इस निर्णय को कोर्ट ने अपने 2018 के कॉमन कॉज फैसले और फिर 2023 में संशोधित दिशानिर्देशों के आधार पर लागू किया, जिसमें ‘मानव गरिमा के साथ मरने का अधिकार संवैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त है। यह फैसला जेबी पारदीवाला और केवी विश्वनाथन की पीठ ने दिया।
हरीश राणा मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
अपने फैसले में पीठ ने साफ किया कि चाहे किसी भी व्यक्ति से कितना भी प्यार किया जाए, अगर उसके ठीक होने की सम्भावना नगण्य है, तो जीवन‑सहन चिकित्सा केवल उसके शरीर को जिंदा रखेगी, न कि उसकी जीवन गुणवत्ता को। इस दौरान अदालत ने हरिश राणा के माता-पिता की भी सराहना की। कोर्ट ने कहा कि उनके माता-पिता ने 13 साल तक अपने बेटे का साथ नहीं छोड़ा और लगातार उसकी देखभाल की। यह उनके प्रेम और समर्पण को दिखाता है।