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विरोध में पूर्व JNU प्रोफेसर ने लौटाया पुरस्कार

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जेएनयू में देशद्रोह मामले को जिस तरह सरकार ने संभाला है उससे जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर चमनलाल बेहद आहत हैं और उन्होंने अपना पुरस्कार लौटा दिया है। प्रोफेसर चमनलाल पहले भी देश में असहिष्णुता के मामले में अपना साहित्य अकादमी का पुरस्कार लौटा चुके हैं।
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जेएनयू मामले में पुरस्कार लौटाने की बात पर चमनलाल बोले कि उन्होंने पुरस्कार के 50 हजार लौटाने की बात कही जो उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान 2003 में मिला था। ये पुरस्कार उन्हें गैर-हिंदी भाषा के हिंदी लेखक होने के लिए मिला था।
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चमनलाल ने कहा कि ये विरोध गृहमंत्री और एचआरडी मंत्री द्वारा कन्हैया कुमार पर किए गए वार को लेकर है। उनका कहना है कि दोनों ही मंत्रियों ने जेएनयू के छात्रों और फैकल्टी को मीडिया के माध्यम से राष्ट्रद्रोही कहा है।

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इससे पहले प्रोफेसर ने अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार जो उन्हें 2002 ‌में मिला था उसे कथित असहिष्णुता वाले मुद्दे पर वापस कर दिया था। साहित्य अकादमी पुरस्कार उन्हें पंजाबी कवि पाश के कविताओं 'समय ओ भाई समय'को हिंदी में रूपांतरित करने के लिए मिला था।
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प्रोफेसर चमनलाल बोले कि एक वीसी की ड्यूटी होती है कि वो अपने फैकल्टी और छात्रों की हर तरह से रक्षा करे। अगर आप ऐसा नहीं करते हैं तो जेएनयू के अंदर आपकी नैतिकत जिम्मेदारी पर सवाल उठेंगे चाहे आपको विश्वविद्यालय के बाहर से एमएचआरडी मंत्रालय और गृह मंत्री या दिल्ली पुलिस का कितना भी सहयोग मिले। नैतिकत ‌अधिकार का ज्यादा असर होता है न‌ा कि 'डंडा फोर्स' का।
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वहीं प्रोफेसर ने वीसी को कैंपस मे पु‌लिस को घुसाने के लिए भी आड़े हाथों लिया। उनका कहना था कि जब आप अंतरिम जांच कर रहे हों तो आप पुलिस को कैंपस में कैसे आने दे सकते हैं।
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उन्होंने बतातया कि उन्होंने ये पुरस्कार लौटाने की सबसे बड़ी वजह ये है कि उनके जमीर पर बोझ है। वो बेहद दुखी और आहत हैं सरकार के रवैये से।
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