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अनोखा बंधनः पहले गुड़िया को प्लास्टर चढ़ाया, तभी बच्ची ने इलाज कराया, डॉक्टर भी हैरान

Thu, 29 Aug 2019 07:37 PM IST
Vikas Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

-11 माह की बच्ची के साथ उसकी गुड़िया भी अस्पताल में भर्ती
-दिल्ली के लोकनायक अस्पताल में गुड़िया वाली बच्ची को देखने के लिए उमड़ रही बच्ची
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मासूम बच्ची के साथ उसकी गुड़िया - फोटो : अमर उजाला
11 माह की मासूम बच्ची के साथ उसकी गुड़िया भी अस्पताल में भर्ती है। डॉक्टरों ने एक ही बेड पर दाखिल बच्ची और उसकी गुड़िया के पैरों पर प्लास्टर चढ़ाया है। लोकनायक अस्पताल में हड्डी रोग ब्लॉक के 16 नंबर बिस्तर पर लेटी इस बच्ची के दोनों पैरों पर कूल्हे तक पट्टी बंधी है। दोनों पैरों को पट्टी से ऊपर लटकाया है ताकि फ्रैक्चर को सही से जोड़ा जा सके। बच्ची के बराबर में उसकी गुड़िया भी इसी स्थिति में है। 

डॉक्टर पहले गुड़िया को दवा और इंजेक्शन देते हैं फिर बच्ची भी खुशी-खुशी उनकी बात मान लेती है। बच्ची और गुड़िया के इस अनोखे रिश्ते को देख डॉक्टर भी हैरान हैं। पूरे अस्पताल में गुड़िया वाली बच्ची का नाम चर्चाओं में है। पूरे अस्पताल के मरीज उसे देखने पहुंच रहे हैं। 
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मासूम बच्ची अपनी गुड़िया के साथ अस्पताल में भर्ती - फोटो : अमर उजाला
दरियागंज निवासी फरीन दो सप्ताह पहले अपनी 11 माह की बच्ची को लेकर अस्पताल पहुंची थीं। घर पर बेड से गिरने की वजह से बच्ची के पैर में फ्रैक्चर हुआ था। लोकनायक अस्पताल के डॉ. मनोज बताते हैं कि बच्ची जिकरा मलिक दर्द से कराह रही थी। मां की गोद में वह छटपटाने लगी जब उसने डॉक्टर को इंजेक्शन लगाते देखा। काफी देर बाद भी जब जिकरा शांत नहीं हुई तो उसकी मां ने डॉक्टरों को बताया कि बच्ची की एक गुड़िया घर पर है। उसे दूध पिलाने के बाद ही खुद पीती है। डॉक्टरों की अनुमति से जब गुड़िया को अस्पताल लाया गया तो उसे देखते ही बच्ची खिल उठी। यह देख डॉक्टर भी हैरान थे। 

स्थिति यह हो गई कि बच्ची को दवा या इंजेक्शन देने से पहले गुड़िया को देना पड़ा। डॉक्टर जब जिकरा को पट्टी बांधने लगे तो वह फिर से रोने लगी। जहन में एक विचार आते ही डॉक्टर ने गुड़िया के पैर पर पट्टी बांधना शुरू कर दिया। इसके बाद जिकरा ने भी आसानी से प्लास्टर चढ़वा लिया। 

इलाज के लिए बच्ची को भर्ती करना जरूरी था, इसलिए गुड़िया को भी उसके साथ रखा गया। जिकरा की मां फरीन बताती हैं कि ये गुड़िया उसकी नानी ने उपहार में दी थी, जब वह 2 माह की थी। तभी से उसे गुड़िया से बेहद लगाव है। घर पर कुछ भी खाने-पीने के लिए पहले गुड़िया को देना पड़ता है इसके बाद ही जिकरा खाती है। 
 
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मासूम बच्ची अपनी गुड़िया के साथ अस्पताल में भर्ती - फोटो : अमर उजाला
पूरे देश के सामने लाने का प्रयास
हड्डी रोग विभागाध्यक्ष डॉ. अजय गुप्ता कहते हैं कि करीब तीन दशक के अनुभव में उन्होंने ऐसा केस कभी नहीं देखा। जिकरा मलिक ने अस्पताल के हर डॉक्टर को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि मासूम मरीज का इलाज उसकी सायकोलॉजी के साथ और कैसे बेहतर किया जा सकता है। अस्पताल के डॉक्टर खुशी और उत्साह के साथ इस केस को पूरे देश के सामने लाने के प्रयास में है। 
 

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मासूम बच्ची अपनी गुड़िया के साथ अस्पताल में भर्ती - फोटो : अमर उजाला
अस्पताल पहुंचते ही विचलित होते हैं बच्चे
ऑस्ट्रेलियन सायकोलॉजिकल सोसायटी के साल 2016 में सामने आए अध्ययन के अनुसार करीब 10 से 15 फीसदी मासूम बच्चे चोट लगने के बाद अस्पताल पहुंचने पर काफी विचलित हो जाते हैं। जबकि 20 से 25 फीसदी बच्चे आईसीयू में पहुंचने के बाद छटपटाने लगते हैं। इसे पोस्ट ट्रॉमाटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) भी कहा जाता है। रोग के अलावा बच्चे अस्पताल में मिलने वाले अलग अनुभव से भी परेशान हो जाते हैं। 
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मासूम बच्ची अपनी गुड़िया के साथ अस्पताल में भर्ती - फोटो : अमर उजाला
चिकित्सा जगत को मिलेगी नई दिशा
दिल्ली के डॉक्टर इस केस को चिकित्सा जगत के लिए नई दिशा देने वाला मान रहे हैं। एम्स के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रवीण का कहना है कि मासूम बच्चे पहले ही काफी डरे होते हैं। अस्पताल पहुंचने के बाद भीड़ और इंजेक्शन आदि देख खौफ में आ जाते हैं। यह केस चिकित्सा जगत में नया उदाहरण है। बच्चों खासतौर पर दो वर्ष से कम आयु वालों के रोग से ज्यादा उनकी मानसिक स्थिति को समझने की जरूरत होती है। इस उम्र के बच्चे न बोल पाते हैं और न ही कुछ बता पाते हैं। ऐसे में इनके दर्द को समझते हुए इलाज देना बड़ी चुनौती होता है। 
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