16 जनवरी 1978 को देश को सूचित किया गया कि 1000, 5000 और 10,000 के नोट चलन से बाहर कर दिए गए हैं। घोषण के अगले दिन यानि 17 जनवरी 1978 को देश के सभी बैंक बंद थे। कहा जाता है कि उस समय रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर आईजी पटेल सरकार के इस फैसले के पक्ष में नहीं थे। उस वक्त भी देश के तमाम बैंकों के बाहर नोटों को बदलने के लिए इसी तरह ही लंबी लाइनें लगीं थीं।
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demonetization
तत्कालीन आरबीआई गवर्नर आईजी पटेल ने बाद में अपनी किताब Glimpses of Indian Economic Policy: an Insider’s View में लिखा कि तत्कालीन वित्त मंत्री एचएम पटेल ने उन्हे सरकार के इस कदम के बारे में सूचित किया था। उन्होंने उस समय ही कहा था कि इस तरह के कदमों से शायद ही कभी कोई बहुत प्रभावी परिणाम निकले हों।
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सरकार के इस कदम के बाद इंडिया टूडे में लिखते हुए जय दूभाषी ने लिखा कि असल में सरकार नेताओं के पास काले धन को जब्त करना चाहती थी जिसका मुख्य निशाना पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं। हालांकि उन्होंने आगे लिखा कि काला धन कमाने वाले बहुत कम मात्रा में अपनी काली कमाई का हिस्सा नगद के तौर पर रखते हैं। इसलिए ये समझना कि लोगों ने अपनी काली कमाई को गद्दों, बिस्तरों या सूटकेस में भर कर रखा है, बेहद ही सामान्य सोच है।
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हालांकि उन्होंने भी ये माना था कि लोग अपनी काली कमाई को बड़ी मात्रा में रियल स्टेट, स्टॉक मार्केट, जमीन खरीदने जैसी जगहों पर लगा कर रखते हैं।
दूभाषी ने लिखा कि असल में ज्यादा कीमत की करेंसी की जगह लोग ब्लैक मनी को उन जगहों पर लगा कर रखते हैं जहां वो सरकार को टैक्स देने से बच सकें। (8 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा के बाद बैंक के बाहर लाइन में लगे लोग और परेशान महिला)