बिहार के रोहतास जिला निवासी बीरेंद्र कुमार (34) को पीलिया के चलते आईएलबीएस में 6 अप्रैल को भर्ती कराया था। बहन कौशल्या देवी ने बताया कि करीब सप्ताह भर बाद डॉक्टरों ने कहा कि मरीज का लिवर प्रत्यारोपण होना है।
15 लाख रुपये का खर्चा आएगा। परिजन घबरा गए, किसान होने के कारण उनके पास घर और जमीन के अलावा कुछ नहीं था। चिकित्सकों से भी परिवार वालों ने यह बता बताई। मगर प्रबंधन के समक्ष चिकित्सक खामोश रहे।
कौशल्या ने बताया कि इस बीच वह ढाई लाख का भुगतान कर चुके थे। 22 अप्रैल को 83 हजार का बिल पकड़ा कर मरीज को लेकर जाने के लिए कहा गया। कौशल्या ने बताया कि उसने जमीन बेचकर ढाई लाख का भुगतान किया था।
अब जेवर बेच कर 52 हजार एकत्र कर लिये थे। वह बाकी 31 हजार का भुगतान करने में असमर्थ हैं। लेकिन चिकित्सकों ने एक नहीं सुनी। पांच दिन तक मरीज को न दवा दी गई न ही कोई जांच की गई। मरीज तड़पता रहा और चिकित्सक शांत रहे।
कौशल्या ने बताया कि जब अस्पताल से छुट्टी दे दी गई तो उन्होंने शाहदरा स्थित रिश्तेदारों को जानकारी दी। वह ईडब्ल्यूएस कमेटी के सदस्य और हाईकोर्ट के वकील डा. अशोक अग्रवाल के पास पहुंचे। डा. अग्रवाल ने द्वारका स्थित वेंकटेश्वर अस्पताल से बात की और मरीज को ईडब्ल्यूएस वर्ग के तहत भर्ती कराया। उसका पीलिया 28 तक पहुंच गया है। जबकि आईएलबीएस में यह लगभग 12 से 16 के बीच में था।
फिलहाल प्रत्यारोपण की जरूरत नहीं
वेंकटेश्वर अस्पताल आने पर पता चला कि मरीज को फिलहाल लिवर प्रत्यारोपण की आवश्यकता नहीं है। सबसे पहले उनका पीलिया नियंत्रण में लाना है। जबकि कौशल्या का कहना है कि आईएलबीएस के अस्पताल तत्काल प्रत्यारोपण के पीछे पड़े थे।
गलत है अस्पताल का व्यवहार
वकील अशोक अग्रवाल का कहना है कि जहां दिल्ली सरकार गरीबों को उपचार देने में जोर दे रही है। वहीं, अस्पताल द्वारा यह व्यवहार दुर्भाग्यजनक है। सरकार को इस पर तत्काल संज्ञान लेना चाहिए। ताकि अस्पतालों में मरीजों के जान से खिलवाड़ बंद हो सके।