निर्भया के चारों दोषियों ने अब भी एक-एक 'लाइफलाइन' बचा रखी है। किसी की दया याचिका, किसी की क्युरेटिव पिटीशन और किसी की पुनर्विचार याचिका के विकल्प बचे हुए हैं। डेथ वारंट जारी होने के बाद भी वे इन कानूनी विकल्पों का इस्तेमाल कर सकते हैं। जिसके पास केवल क्यूरेटिव पिटीशन दायर करने का विकल्प है, उनके लिए वह आखिरी रास्ता है, लेकिन जिनके पास पुनर्विचार और दया याचिका का विकल्प बचा हुआ है, उनका मामला अब भी लंबा खिंच सकता है।
अगर वे सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू या क्यूरेटिव पिटीशन दाखिल करते हैं, तो उनके खारिज होने के बाद भी राष्ट्रपति के सामने दया याचिका दायर किए जाने का प्रावधान है। राष्ट्रपति संविधान के अनुच्छेद-72 के तहत दया याचिका पर सुनवाई करते हैं। इस दौरान राष्ट्रपति गृह मंत्रालय से रिपोर्ट मांगते हैं। सरकार अपनी सिफारिश राष्ट्रपति को भेजती है और फिर राष्ट्रपति दया याचिका का निपटारा करते हैं। अगर राष्ट्रपति दया याचिका खारिज कर देते हैं तो उसके बाद मुजरिम को फांसी पर लटकाने का रास्ता साफ होता है। ऐसे में निर्भया के दोषियों ने अगर राष्ट्रपति से गुहार लगाई, तो फांसी टल सकती है।
अगर 15 दिनों के अंदर सभी विकल्पों पर फैसला साफ हो जाता है तो 22 तारीख को फांसी तय है, लेकिन अगर किसी तरह का पेंच फंसा तो फांसी टल भी सकती है। मसलन, यदि दोषियों में से किसी ने राष्ट्रपति को दया याचिका भेजी, जिसपर 22 जनवरी तक फैसला नहीं आया, तो उसकी फांसी इसी आधार पर टल सकती है। कानून के मुताबिक फांसी से पहले दोषी को उसके मौलिक और कानूनी अधिकार मिलने चाहिए। ऐसे में इन अधिकारों का फायदा उठाकर निर्भया के दोषी बचने की कोशिश कर सकते हैं। यहां तक की कानून दोषियों को डेथ वारंट को चुनौती देने का अधिकार भी देता है।
मालूम हो कि पिछले दिनों कानूनी विकल्पों के इस्तेमाल के बारे में पूछे जाने पर दोषियों ने तिहाड़ जेल प्रशासन को लिखित जवाब दिया था कि वे अपने अधिकारों का इस्तेमाल करना चाहते हैं। ऐसे में क्यूरेटिव पिटीशन दाखिल कर वे फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलने की गुहार भी लगा सकते हैं। हालांकि क्यूरेटिव पिटीशन खारिज हो जाने के बाद वे किसी तरह की कानूनी सहायता नहीं ले पाएंगे।