हत्या के बाद मिटाता था पहचान
हत्या के बाद शव से हाथ पैर, सिर को अलग कर देता था ताकि मृतक की पहचान न हो। इनमें से एक शव की पहचान ही नहीं हो सकी थी। पुलिस को तिहाड़ जेल के गेट नंबर तीन के सामने 24 व 25 अप्रैल 2007 की लावारिस हालत में एक बोरा पड़ा मिला। बैग की तलाशी लेने पर उसमें 28 साल के एक युवक का सिर कटा शव मिला। शव की पहचान छिपाने के लिए युवक का सिर अन्य स्थान पर फेंका गया। गेट नंबर तीन पर स्थित एटीएम के सुरक्षा गार्ड अखिलेश सिंह ने 25 अप्रैल 2007 की सुबह पुलिस को लावारिस बोरे की सूचना पुलिस को दी थी। मौके पर पुलिस ने पाया कि युवक का शव सफेद चादर में लपेटा गया था। शव का सिर, हाथ-पैर व उसका गुप्तांग गायब था। पुलिस ने उसे गुप्ता सूचना के आधार पर मियांवली इलाके से शिव मंदिर के नजदीक से गिरफ्तार किया था। अदालत ने भी उसके अपराध को दुर्लभतम मानते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। अदालत ने कहा था कि चंद्रकांत झा ने जिन लोगों की हत्या की, वह सब निर्दोष थे। इतना ही नहीं उसने पुलिस व कानून व्यवस्था को एक बार नहीं बल्कि बार-बार चुनौती दी। उसके सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है। उसने जिस तरह से निर्दोष लोगों की हत्याएं कीं, उसके मद्देनजर मृत्युदंड उसके लिए सही सजा है।