राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उच्च शिक्षा पर चिंता जताते हुए कहा कि शोध और नवाचार की कमी के कारण देश के विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरे नहीं हैं। (सभी फोटो: हिमांशु सोनी/अमर उजाला, ग्रेटर नोएडा)
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अंतरराष्ट्रीय मानकों पर पिछड़े हैं देश के विश्वविद्यालय: राष्ट्रपति
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अब शिक्षा में शोध क्रांति की जरूरत है ताकि वैश्विक स्तर के संस्थान तैयार कर आर्थिक दुनिया से मुकाबला किया जा सके। शिक्षा के अवसर का उपयोग और उत्कृष्टता का संतुलन बनाए रखना होगा।
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राष्ट्रपति सोमवार को दादरी एनएच-91 स्थित शिव नाडर यूनिवर्सिटी (एसएनयू) का उद्घाटन करने आए थे। उन्होंने यूनिवर्सिटी परिसर में कदंब का पेड़ लगाया।
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शिक्षकों के आवासीय भवन की नींव रखी। छात्र और शिक्षकों को संबोधित करते हुए अनुसंधान आधारित एसएनयू को भारत निर्माण में योगदान देने वाला विवि बताया। उन्होंने कहा कि 1950 तक देश में 20 यूनिवर्सिटी थीं जिनकी संख्या अब 712 है।
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उस दौरान 500 कॉलेज थे जो अब 36000 हो गए। संख्या बढ़ी है लेकिन गुणवत्ता और मानक नहीं। शोध और नवाचार में कमी इसकी सबसे बड़ी वजह है। उच्च शिक्षा में पंजीकृत 60 फीसदी छात्रों की हिस्सेदारी प्राइवेट यूनिवर्सिटी में है लेकिन उद्योगों की जरूरत के मुताबिक पेशेवर तैयार न करना और गुणवत्ता में गिरावट खतरे की घंटी है।
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इसमें सुधार नहीं किया गया तो डिग्री धारकों की संख्या बढ़ जाएगी और ट्रेंड मैन पावर नहीं मिलेगी। हालांकि दुनिया के टॉप-100 संस्थानों में देश के दो संस्थानों को शुमार किए जाने पर उन्होंने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि आगे संख्या और बढ़ेगी।
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इस मौके पर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक ने कहा कि नवाचार को बढ़ावा देने वाली सोच और अनुसंधान के क्षेत्र में रुझान की कमी से भारतीय संस्थानों की वैश्विक स्तर पर उपस्थिति नहीं है। इस मौके पर एचसीएल के संस्थापक शिव नाडर, यूपी के मंत्री शाहिद मंजूर और यूनिवर्सिटी के चांसलर एसएन बालाकृष्णन और स्टाफ मौजूद रहा।