गांव अटाली, समय 12:00 बजे, गांव का बस अड्डा, जहां बृहस्पतिवार को भी अधिकांश दुकानें बंद रहीं। पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) के जवान चाय की चुस्की ले रहे थे। गांव के अंदर जाने वाली गली पर बैरियर लगे थे। लेकिन गांव की गमगीन स्थिति आंसुओं से भरी ये आंखें बयां कर रही हैं।
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अटाली हिंसा: इन पीड़ितों की दास्तां सुन आप भी रो पड़ेंगे
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यहां आने-जाने वाले लोगों की पूछताछ की जा रही थी। थोड़ी दूर चलने पर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के घर दिखाई दिए। इन घरों में बिखरे पत्थर, रोड़े, तोड़फोड़ के निशान, आगजनी से हुए काले धब्बे और आग की वजह से काली हो चुकी जमीन पूरी स्थिति को बयां करने के लिए काफी थी।
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घर वापस पहुंचे लोग पानी के सहारे इसे साफ करना चाहते हैं, लेकिन पानी भी इस कालिख को धो नहीं पा रहा है। गली में बने एक घर में बैठा सहाबुद्दीन इस उधेड़बुन में लगा था कि वह कैसे घर की मरम्मत कराए। घर में पंखा, वॉशिंग मशीन, टेबल, मेज आदि सब सामान टूट चुका है।
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यहां तक कि उत्पातियों ने बिजली के बोर्ड को भी तोड़ दिया। 232 रुपये प्रतिदिन की दिहाड़ी पर काम करने वाले सहाबुद्दीन का जन्म इसी गांव में हुआ था। उससे बात करने पर वह चिंता में डूब गया। बोला, भैंस के लिए 70 हजार रुपये निकाले थे, लेकिन वह भी संघर्ष में किसी ने चुरा लिए। बहू के लिए बड़े अरमान से नई चेन बनवाई थी। वो भी अब नहीं मिल रही। अलमारी खुली हुई मिली।
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इसी घर की सदस्य आसिन पहुंची। महिला बोली, मीडिया नहीं होता तो हमारी कौन सुनता। उसने दुखी मन से घर दिखाया। रात कैसे कटी, इस सवाल पर वह फफक-फकक कर रोने लगी।
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उसने कहा, ‘आंख कहां लग पाई। कभी घरवाला जागता, तो कभी मैं। अब तो हल्की सी आहट से भी डर लगता है। दहशत के कारण बच्चों को गांव नहीं लाए। बच्चे जिद कर रहे थे, लेकिन भारी मन से उन्हें भाई के घर पर भेज दिया।’
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उन्होंने बताया कि आग लगाने वाले पड़ोसी तो थे। कभी उनके किसी काम के लिए मना नहीं किया। हर दुख-कष्ट में उनके घर पर काम किया, लेकिन उन्होंने उस बात की लाज भी नहीं रखी।
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वहीं अपने जले घर को देखकर फखरुद्दीन को रोना आ गया। घर के दो कमरों की छत ही उड़ी हुई थी। सारा घर काला हो गया था। उसने बताया कि घर को उड़ाने के लिए सिलेंडर का प्रयोग किया गया।
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अब सभी कमरों की छत दोबारा बनवानी पड़ेगी। घर के अंदर एक औरत अपने रोते हुए बच्चे को चुप करा रही थी। इस पांच साल के अजहर के पास पहनने के लिए नेकर तक नहीं थी। उसके अब्बू रईशुद्दीन ने उसे गले लगाया और बाहर ले गया।
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पूरी जिंदगी कड़ी मेहनत कर घर बसाया था, वो भी अब नहीं रहा। जिंदगी कैसे चलेगी, पता नहीं।
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बच्चे डर रहे हैं। वहीं, पास में नन्नू का घर था, जो पूरी तरह जला हुआ था। घर में एक सामान भी नहीं बचा था। बर्तन तक जल गए। नन्नू ने रोते-रोते कहा कि इस घटना ने कमर तोड़ दी।
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खाना कभी रेडक्रास भेज रहा है तो कभी बिरादरी वाले। नासिर अली का घर भी आगजनी से काला पड़ गया, यहां मजदूर लगे हुए थे।
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फखरुद्दीन ने बताया कि रात पड़ोसी के घर में सोए। घर में न पानी है, न बिजली और न गैस। समझ में नहीं आ रहा है, कहां से जिंदगी शुरू करें। आधा परिवार अभी अपने रिश्तेदार के घर कैली भेज दिया है।
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निजाम अली ने बताया कि मिलने वालों का तांता लगा हुआ है। घर आकर थोड़ी सी खुशी हुई, लेकिन जख्म अभी भरा नहीं है।