कांग्रेस के कद्दावर नेता सज्जन कुमार को ताउम्र कैद की सजा मिलने के बाद भी उनकी मुश्किलें कम नहीं हुई हैं। अब तक उन्हें निचली अदालत से राहत मिलती रही है यह पहला मामला है जिसमें हाईकोर्ट से उन्हें सजा मिली है।
एक अन्य मामले में भी चश्मदीद गवाह ने अदालत के समक्ष उनकी पहचान की थी और इस मामले में भी जल्द फैसला आ सकता है। उन पर करीब आधा दर्जन मामले अभी भी लंबित है। सज्जन से पहले कांग्रेस के ही दिग्गज नेता एचकेएल भगत भी एक गवाह के बयान के आधार पर जेल भेजे गए थे, लेकिन उनकी मौत के कारण मामले को बंद करना पड़ा।
सज्जन कुमार दिल्ली में कांग्रेस के एक मात्र ऐसे नेता माने जाते है जिनका रुतबा है और भीड़ जुटाने में सक्षम है। उनको सजा होने के बाद पूरी कांग्रेस ने चुप्पी साध ली है। नवंबर 84 दंगों के बाद से ही पूर्व सांसद सज्जन कुमार, जगदीश टाइटलर व दिवंगत एचकेएल भगत का नाम आरोपियों के तौर पर प्रमुखता से लिया जाता रहा है।
सज्जन कुमार का रुतबा इतना रहा है कि जब सीबीआई उन्हें गिरफ्तार करने मादीपुर स्थित उनके घर गई थी तो जमकर हंगामा हुआ था और उसके बाद से कभी भी सीबीआई या पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार करने की हिम्मत नहीं दिखाई।
उनके खिलाफ दिल्ली कैंट इलाके के अलावा सुल्तानपुरी, मंगोलपुरी नांगलोई इत्यादि इलाकों में हुए दंगो के मामले विचाराधीन हैं। इनमें से सुल्तानपुरी के मामले में चश्मदीद गवाह शीला कौर व चामकौर ने अदालत के समक्ष शिनाख्त कर बताया था कि सज्जन के उकसावे के कारण ही उनके परिवार के सदस्यों को जिंदा जलाकर मार दिया गया था।
इसके अलावा अन्य मामलों में भी गवाही चल रही है ओर संभावना जताई जा रही है कि अगले वर्ष यानी 2019 में सभी मामलों में फैसला आ जाए। कानून के जानकारों का मानना है कि जिस प्रकार हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए सज्जन कुमार को सजा सुनाई है उसका असर अन्य मामलों में पर भी पड़ेगा। इस फैसले के बाद जगदीश टाइटलर की भी मुश्किलें बढ़ सकती है।
दरअसल हथियार व्यवसायी अभिषेक वर्मा का आरोप है कि टाइटलर ने गवाहों को खरीदने का प्रयास किया था। अभिषेक वर्मा का हाल ही में लाई डिटेक्टर टेस्ट हुआ है और रिपोर्ट उनके खिलाफ हुई तो तय है कि टाइटलर भी लपेटे में आ सकते हैं।
सज्जन कुमार हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर करेंगे। उनके वकील का कहना है कि इन गवाहों के बयान पहले ही दर्ज हो चुके थे और अदालत ने उन्हें बरी कर दिया था लेकिन अब उन्हीं गवाहों के बयानों पर सजा कैसे दी जा सकती है।
सज्जन को अपील दायर करने से पूर्व हर हाल में समर्पण करना ही होगा। इसके अलावा जुर्माने की राशि भी जमा करवानी होगी। अपील दायर करने के लिए यह कानूनन जरूरी है। इसी के बाद सर्वोच्च न्यायालय तय करेगा कि सज्जन को अपील के निपटारे तक जमानत प्रदान की जाए या नहीं।
कांग्रेस नेता सज्जन कुमार का सियासी सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा। शुरुआत में रेहड़ी पर चाय बेची और इसके बाद 70 के दशक से कांग्रेस में सक्रिय हुए। इस दौरान उनका कांग्रेस नेता संजय गांधी से संपर्क हुआ।
सबसे पहले बाहरी दिल्ली के मादीपुर इलाके से सज्जन कुमार ने नगर निगम का चुनाव लड़ा और 1977 में पार्षद बने। कांग्रेस ने उन्हें 1980 में बाहरी दिल्ली से उम्मीदवार बनाया और सिर्फ 35 साल की उम्र में सांसद बने।
2004 में भारतीय राजनीति में उनके नाम दो रिकॉर्ड दर्ज हुए। पहला, तो देशभर में लोकसभा चुनावों में सबसे ज्यादा मत पाने का रिकार्ड हासिल किया। वहीं, दिल्ली से सबसे अधिक मतों से चुनाव जीतने का रिकार्ड भी उनके ही नाम रहा। उन्हें आठ लाख से अधिक मत मिले थे। इन सबके बीच 1984 में इंदिरा गांधी की मौत के बाद पनपे दंगों की आंच उनके राजनीतिक करियर पर भी आई।
कांग्रेस ने सज्जन कुमार को टिकट नहीं दिया। इतना ही नहीं, सिख समुदाय की नाराजगी से बचने के लिये कांग्रेस ने 1989 में भी उन्हें टिकट नहीं दिया। 1991 में कांग्रेस ने बदले सियासी माहौल में एक बार फिर बाहरी दिल्ली संसदीय क्षेत्र से उन्हें टिकट दिया और वह दुबारा संसद पहुंचे।
इस बीच सिख दंगों को लेकर चर्चा काफी गर्म रही। राजनीतिक पार्टियों में आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहा। 1993 में दिल्ली विधानसभा चुनाव हुए और सज्जन के कई साथी विधानसभा में चुनकर आ गए, लेकिन बाद में 1996 के चुनाव में बीजेपी के वरिष्ठ नेता कृष्णलाल शर्मा के हाथों उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इस बीच अलग-अलग अदालतों में सज्जन कुमार के खिलाफ कई मामले दर्ज हो चुके थे।
सीबीआई ने भी सज्जन कुमार के खिलाफ आरोपपत्र दायर कर दिया था। नाजुक हालत देखते हुए 1998 और 1999 में एक बार फिर कांग्रेस ने लोकसभा चुनावों में उनका टिकट काट दिया।
बावजूद इसके बाहरी दिल्ली में सज्जन का प्रभाव कम नहीं हुआ और 2004 में वे फिर से लोकसभा का टिकट पा गए। वर्ष 2009 के चुनावों में दंगो के मामले को लेकर सज्जन का टिकट कट गया लेकिन वे अपने भाई रमेश कुमार को टिकट दिलवाने में कामयाब रहे और उनको सांसद बनवा दिया।