एनएच-24 पर दिल्ली से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ठेठ ग्रामीण इलाके अमरोहा तक अमर उजाला की टीम ने गांवों और कस्बों से गुजरते हुए लोगों से बात की। हर जगह लोग नए नोटों की कमी से जूझते दिखे। कैश की यह कमी सबसे ज्यादा किसानों, छोटे दुकानदारों और व्यापारियों को प्रभावित कर रही है। हालत यह है कि किसानों ने परेशान होकर गेहूं की बुआई ही रोक दी है तो व्यापारी इस उधेड़ बुन में हैं कि संकट ज्यादा चला तो घर कैसे चलाएंगे। किसानों का कहना है हम हाथ पर हाथ रखे बैठे हैं ऐसे बुरे हालात तो कभी नहीं थे। पेश है भूपेंद्र कुमार की रिपोर्ट... (सभी फोटोः लाल सिंह)
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एनएच 24 टोल प्लाजा
- फोटो : लाल सिंह/अमर उजाला
सूना टोल प्लाजा और बैंक की कतारें
सरकार ने सभी टोल प्लाजा पर 24 नवंबर तक टैक्स माफ किया हुआ है। सवेरेे 10 बजे सुनसान से डासना टोल प्लाजा पार करते ही बैंकों और एटीएम के सामने लंबी-लंबी कतारें दिखनी शुरू हो जाती हैं। खासकर सरकारी बैंकों के सामने तो लाइनें और धक्का-मुक्की होती सहज ही दिख जाती है। कस्बे के स्टेट बैंक आफ पटियाला और पंजाब नेशनल बैंक का ऐसा ही हाल था और पूजा फूल भंडार सूना था, भगवान को चढ़ाने के लिए फूल लेेने वाला कोई ग्राहक नहीं था। यही हाल मसूरी कस्बे के केनरा और बैंक आफ बड़ौदा का था।
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खाली पड़े बाजार
- फोटो : लाल सिंह/अमर उजाला
बाजार में ऐसा सन्नाटा तो कभी नहीं था
करीब 11 बजे बाजार शहरों में भी खुल जाते हैं। गांव देहात के बाजार थोड़ा जल्दी खुलते हैं और जल्दी सिमट जाते हैं, लेकिन बाबू गढ़ छावनी के बाजारों में रौनक नहीं थी। फल बेचने वाले करीमुद्दीन कहते हैं लोगों के पास खुले पैसे नहीं हैं, अब तो हम भी ज्यादा सामान नहीं ला रहे। पता नहीं कैसे आगे काम चलेगा।
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मोगा ढाबा
- फोटो : लाल सिंह/अमर उजाला
धंधा तो मंदा है... लोग कहां से लाएं पैसा
दोपहर 12 बजे गजरौला के बाहर निकलते ही मोगा पंजाबी ढाबा दिखता है। यहां काउंटर पर बैठे हरदीप कहते हैं, दिक्कत तो है लोगों के पास पैसा ही नहीं है। हालांकि, ज्यादातर लोग 100 के नोट लाते हैं पर कुछ लोग पुराने के लिए भी कहते हैं। धंधा मंदा तो हुआ है, दस हजार की कमाई दो हजार रह गई आने वाले वक्त में बेहतरी की उम्मीद है।
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चश्मे वाला
- फोटो : लाल सिंह/अमर उजाला
चवन्नी रह गया काम, कौन पहनेगा चश्मा
दोपहर का 1 बजा है, लेकिन अमरोहा के टीपी नगर चौराहे पर चश्मे और टोपियों की रेहड़ी लगाए बैठे जगदीश के हाथों से वक्त फिसलता जा रहा है। आपको क्या बताएं धंधा चवन्नी रह गया, लोगों की जेब में पैसा नहीं है, ऐसे में भला कौन चश्मे पर खर्चा करेगा। फर्नीचर की दुकान पर परेशान अशरफ कहते हैं लोग शादी के लिए बुक आर्डर कैंसल कर रहे हैं। हालात कब बेहतर होंगे समझ में नहीं आ रहा। यही हाल कपड़े की दुकान चलाने वाले शहजाद का है। कहते हैं दिल्ली के बाजार में हमें कोई उधारी नहीं दे रहा, हम भी भला कब तक उधार देंगे।
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मिराज अहमद, गजरौला में अपनी दुकान में खाली बैठे
- फोटो : लाल सिंह, अमर उजा
तीन दिन में एक भी बर्तन नहीं बिका
शादियों के सीजन में अच्छा कारोबार करने वाले मिराज कहते हैं बुरा हाल है, तीन दिन हो गए एक भी ग्राहक दुकान पर नहीं आया है। सिर्फ हमारा नहीं पूरे बाजार का यही हाल है। बजरंग तराई सीड्स के नाम से दुकान चलाने वाले लक्ष्य कहते हैं, असर तो पड़ा है। किसानों ने फिलहाल गेहूं की बुआई रोक दी है। कोट बाजार में सिलाई मशीन ठीक करने वाले शादाब फीकी हंसी हंसते हुए कहते हैं, कौन आएगा हमसे मशीन ठीक कराने।
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गुड़ मंडी
- फोटो : लाल सिंह/अमर उजाला
गुड़ की मिठास हुई गुम बंद करेंगे कोल्हू
अमरोहा में गुड़ की बड़ी मंडी है। लोग आसपास के गांवों से यहां ट्रैक्टर भरकर गुड़ बेचने आते हैं, आढ़ती कहते हैं कि हम इन्हें नए नोट कहां से दें, बैंक में दिनभर लाइन में लगो, अपना पैसा है फिर भी धक्के खाओ और मिलेंगे दो हजार। उधार पर धंधा चल रहा है। मीरपुर से आए गन्ना किसान भूरा भड़क जाते हैं, बस यह आखिरी ट्रैक्टर माल है, अब कोल्हू बंद करने के अलावा चारा नहीं। ऐसा ही हाल एक और किसान मोहसिन का है, हमें जो रेट मिलेगा ले लेंगे क्या करें कुछ समझ में नहीं आ रहा।
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ब्रजघाट पर बिलखता नाविक
- फोटो : लाल सिंह/अमर उजाला
ब्रजघाट पर बिलखता नाव वाला
दोपहर के 3 बजे हैं, ब्रज घाट सूना सा है, कुछ लोग दिखते हैं पर वे भी धार्मिक कर्मकांड निपटाने आए हैं। नाव वाले महेश मुस्कराकर मिलते हैं पर जरा बात करने पर ही रो पड़ते हैं और कहते हैं कि मेरे पास पैसे नहीं हैं। लोग आ नहीं रहे क्या करूं, कैसे खर्चा निकलेगा। यही हाल घाट पर बैठे फूल और पूजा सामग्री बेचने वालों का है।
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दुकानदार
- फोटो : लाल सिंह/अमर उजाला
हताश हैं हैंडलूम बेचने वाले
पिलखुवा को हैंडलूम नगरी कहा जाता है। शाम के 5 बजे हैं और गुलजार रहने वाली मुख्य सड़क पर दूर से बेड शीट, कंबल, दरी बेचने वालों की दुकानें दिख जाती हैं। एक भी दुकान पर ग्राहक नहीं है। हताश होकर एक दुकान मालिक विजय कहते हैं कि आप ही बताओ यह संकट कब तक रहेगा। हमारे पास तो पैसे नहीं हैं।
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अपने हालात बनाते मुजासिश
- फोटो : लाल सिंह/अमर उजाला
300 किलोमीटर और तीन खुशनुमा चेहरे भी नहीं
सुबह से शाम तक की इस लगभग 300 किलोमीटर लंबी यात्रा से लौटते हुए तीन खुशनुमा चेहरे भी याद नहीं आए। ज्यादातर लोगों का कहना था कि फैसला अच्छा हो सकता है पर इसे लागू शायद अच्छी तरह नहीं किया गया। रोज कमाने खाने वाले और किसान ही सबसे ज्यादा परेशान हैं।
कार्ड स्वैप छोड़िए यहां चेक लिखना तक नहीं आता
अमरोहा के बाजार में बूट हाउस के मालिक ने कैश की कमी को देखते हुए बैंक से स्वैप मशीन ले ली, उनकी 40 साल पुरानी दुकान है, लेकिन यह रणनीति भी पूरी तरह फ्लॉप हो गई। दो हफ्ते में एक भी ऐसा ग्राहक नहीं आया जिसने उनसे कार्ड के जरिये पेमेंट किया हो। वे हताश हैं, अब कहते हैं यहां लोगों चेक तक लिखना नहीं आता, कार्ड क्या चलाएंगे।