मैं हूं रामलीला मैदान। मैं वह धरती हूं, जिस पर दिल्लीवासियों ने पहले प्यास बुझाई और उसके बाद पेट भरा और संप्रदायों के बीच सौहार्द का माहौल बना। मेरा इतिहास समृद्ध और विविधताओं से भरा है, मैंने हर युग, हर आंदोलन और हर शपथग्रहण समारोह को अपने में समेटा है। मैं वही स्थल हूं, जहां से कई राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों की लहरें उठीं, जहां सरकारें बनीं और टूटीं और सबसे महत्वपूर्ण जहां देश की समस्याओं और उम्मीदों का साक्षात्कार हुआ।