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बड़े शहरों की नौकरी छोड़ इन युवाओं ने उठाया ऐसा कदम, हर कोई कर रहा सलाम

Sat, 10 Sep 2016 10:35 AM IST
विनोद मुसान / अमर उजाला, देहरादून
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youth - फोटो : amar ujala
उत्तराखंड मुख्यमंत्री हरीश रावत तमाम मंचों पर रिवर्स माइग्रेशन की बात कर रहे हैं, लेकिन सरकारी मशीनरी के स्तर पर कुछ काम होता नहीं दिख रहा है। दूसरी तरफ कुछ उत्साही युवा हैं, जो अपने स्तर पर लगातार इस मुहिम को आगे बढ़ा रहे हैं। रिवर्स माइग्रेशन की इन युवाओं की मुहिम रंग भी ला रही है, तमाम लोग इनसे ट्रेनिंग लेकर अब अपने गांव में खुद का काम कर रहे हैं। वे उजड़े घरों को फिर से आबाद करना चाहते हैं, नहीं चाहते कि गांव का एक भी खेत-खलिहान बंजर रहे।
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ranjana
12वीं तक की शिक्षा गांव में लेने के बाद एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय से फार्मेसी में स्नातक किया। इसके बाद दिल्ली स्थित बहुुराष्ट्रीय कंपनी में करीब तीन साल तक क्वालिटी ऑफिसर की जॉब की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम से प्रभावित होकर नौकरी छोड़ स्वरोजगार अपनाने का फैसला किया। आज रुद्रप्रयाग जिले में रंजना का नाम बागवानी, कृषि, मशरूम उत्पादन और फल संरक्षण के लिए जाना जाने लगा है। मात्र 24 साल की रंजना अब तक सैकड़ों लोगों को मशरूम
उत्पादन की ट्रेनिंग देकर स्वावलंबी बना चुकी हैं। इतना ही नहीं अभी हाल ही के दिनों में रंजना के प्रयासों से उसके गांव भीरी को जिला उद्यान विभाग द्वारा मशरूम उत्पादन के लिए मॉडल विलेज घोषित किया गया। जिला उद्यान अधिकारी डीएल मखनवाल द्वारा गांव में निरीक्षण के बाद खुद इसकी घोषणा की गई। 
रंजना रावत 
पुत्री दरबान सिंह रावत
ग्राम भीरी, चंद्रापुरी, रुद्रप्रयाग
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vipin
1998 में विजय जब कामर्स में ग्रेजुएट हुए तो उनके सामने भी रोजगार के लिए किसी बड़े शहर की शरण के अलावा दूसरा चारा नहीं था। आखिर दिल्ली की राह पकड़ ली। इसके बाद खूब तरक्की की। पिछले दिनों तक पावर सेक्टर ऑयल एंड गैस में बतौर मैनेजर आपरेशन काम कर रहे विजय आज अपने गांव में ही मशरूम यूनिट लगा रहे हैं। बकौल विजय, वर्षों पूर्व गांव में कुछ करने का सपना देखा था, जिसे मैं अब पूरा करूंगा। आर्गेनिक फार्मिंग, मछली, बकरी, फल उत्पादन इत्यादि बहुत कुछ है, जिसे वैज्ञानिक तरीके से किया जाएगा। अच्छी बात यह है कि गांव के युवा उनके साथ जुड़कर अब इस काम को करना चाहते हैं। 
विजय सिंह बुटोला
पुत्र वीर सिंह बुटोला
ग्राम अमोली, जखंड, टिहरी गढ़वाल

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vigyan
विज्ञान वैभव के गांव को लोग भूतिया गांव कहते हैं। कारण, गांव में मात्र तीन ऐसे घर हैं, जिनमें लोग रहते हैं। इनमें से एक घर विज्ञान वैभव का भी है। कुछ समय पहले तक वैभव के माता-पिता घर में अकेले रहते थे, लेकिन अब 30 साल के वैभव ने भी देहरादून में नौकरी छोड़ गांव में रहने का फैसला किया। वैभव ने मशरूम और वैज्ञानिक तरीके से फल-सब्जियों का उत्पादन शुरू किया। इसके बाद गांव में कुछ चहल-पहल शुरू हुई। आज गांव में वैभव के काम को देखने के लिए अधिकारियों,
एनजीओ और तमाम लोगों का तांता लगा रहता है। बकौल वैभव, अभी तो शुरूआत भर है, सपना उस दिन पूरा होगा, जब गांव फिर से आबाद हो जाएगा। तब हमारे गांव को कोई भूतिया गांव नहीं कहेगा।
विज्ञान वैभव नौटियाल
पुत्र भगवती प्रसाद नौटियाल
ग्राम सिड़ियाधार, पोखरा, पौड़ी गढ़वाल
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jatin
जिस दिन जतिन मुंबई से सेफ की नौकरी छोड़कर घर पहुंचा तो माता-पिता के लिए यह ठीक ऐसा था, जैसे बेटा बार्डर से घर लौटा हो। जतिन ने भी मोथरोवाला, देहरादून में दिव्या रावत से मशरूम की ट्रेनिंग ली। मशरूम यूनिट लगाने के लिए दिव्या
अपनी टीम के साथ खुद जतिन के गांव पहुंची। मात्र 30 हजार रुपये लगाकर जतिन ने पहली ही फसल में दोगुनी कमाई की।आग उनकी योजना गांव में ही रहकर खेती से जुड़े तमाम दूसरे कामों को आगे बढ़ाने की है। बताते हैं फल संरक्षण और सब्जियों के उत्पादन के लिए उनके गांव में उपयुक्त माहौल है। जिसे वे आगे बढ़ाएंगे। 
जतिन नेगी
पुत्र विनोद सिंह नेगी
धारकोट, प्रतापनगर, टिहरी गढ़वाल
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divya
यह वह लड़की है जो इन सभी की मास्टर ट्रेनर रही है। दिव्या आज पहाड़ों में गांव-गांव जाकर मशरूम उत्पादन के जरिए स्वरोजगार की अलख जागा रही है। बकौल दिव्या, मैंने जो कुछ सीखा है, वह सब मैं दूसरों को बांटना चाहती हैं। शुरूआत के बाद अब बेहतर परिणाम सामने आने लगे हैं।
दिव्या रावत, मोथरोवाला देहरादून
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vasuki tal
आपदा के बाद केदारनाथ में सुरक्षा ड्यूटी पर तैनात पुलिस टीम धाम में पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी विशेष कार्य कर रही है। बीते दो वर्षो से जहां पुलिस पुलिस कैंप में फूल और साग-भाजी उगा रहे हैं, वहीं समय-समय पर केदारनाथ से वासुकीताल तक सफाई अभियान भी चला रहे हैं। 11,500 फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ में यात्रा से लेकर शीतकाल में पुलिस ड्यूटी दे रही है। सितंबर 2013 से वहां बतौर चौकी प्रभारी तैनात विपिन चंद्र पाठक और उनकी टीम ने ड्यूटी के साथ पर्यावरण संरक्षण की अनूठी मिसाल पेश की है। वर्ष 2015 में मंदिर से दो किमी पहले रुद्रा प्वाइंट स्थित पुलिस कैंप में उन्होंने ब्रह्मकमल और अन्य फूल उगाकर ब्रह्मवाटिका की स्थापित की।

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dhan singh
विद्यालय में ज्ञान बांटने के साथ ही शिक्षक धन सिंह घरिया हिमालय को दूषित होने से बचाने की मुहिम में भी जुटे हुए हैं। उन्होंने हर साल बंजर भूमि पर 12 हजार पौधों के रोपण का लक्ष्य रखा है। घरिया जीआईसी गोदली में राजनीतिक विज्ञान के शिक्षक हैं। उन्होंने पोखरी ब्लॉक के कलसिर गांव में जो सैकड़ों पौधे रोपे हैं उनकी हरियाली बरबस ही लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने के साथ लोगों में पर्यावरण संरक्षण की अलख भी जगा रही है।

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manoj
चिपको आंदोलन में महिलाओं के साथ पर्यावरण की अलख जगाने वाले स्वर्गीय चक्रधर तिवारी ने वर्ष 2002 से जनपद के विभिन्न हिस्सों में पौधरोपण कार्य किया। जब वर्ष 2014 में उनका निधन हो गया तो उनके बेटे मनोज तिवारी ने पिता की विरासत को सहेजने के लिए संकल्प अभियान की शुरूआत की। अभी तक मनोज तिवारी करीब दस हजार पौधों का रोपण कर चुके हैं। मनोज तिवारी जीआईसी बैरांगना में शिक्षक हैं। वे विद्यालय से आने के बाद रोपित पौधों के संरक्षण में लग जाते हैं।
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youth
पर्यावरण संरक्षण को रोजगार से कैसे जोड़ते हैं। यह देखना है तो उत्तरकाशी चले आइए। यहां नौगांव क्षेत्र के नैणी गांव के लोग देश और दुनिया के लिए मिसाल बन गए हैं। गांव के लोगों ने पर्यावरण संरक्षण से जुड़कर न केवल अपने लिए रोजगार तैयार किया, बल्कि काफी हद तक उन लोगों को एक संदेश भी दिया है, जो अपने गांव से पलायन कर रहे हैं। आज इस गांव में 90 प्रतिशत परिवारों के सेब के तीन-तीन बगीचे तैयार होकर अच्छी आय का जरिया बने हुए हैं। यहां 20 परिवार फूलों की खेती से भी सालाना 50 से 90 हजार तक आमदनी कर लेते हैं। मटर, टमाटर तथा सब्जी की खेती भी खेतों में लहलहाती है।
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