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...यहां मोबाइल नेटवर्क के लिए जान हथेली पर रखकर खड़ी चढ़ाई करने को मजबूर हैं लोग, तस्वीरें देखिए

Wed, 13 May 2020 02:30 AM IST
अलका त्यागी शालू दताल, अमर उजाला, धारचूला
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- फोटो : अमर उजाला
शनिवार नौ मई। आमतौर पर कम आवाजाही वाले छियालेख में लोगों का मजमा सा लगा हुआ था। ये लोग उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में धारचूला में अपने परिजनों से फोन पर बात करने की जुगत में थे। इसके लिए छियालेख से 500 मीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़कर मोर्चा टॉप नामक जगह पर जाना पड़ता है। दीगर ये कि वहां से भी नेपाली नमस्ते नेटवर्क के जरिये ही बात हो पाती है, क्योंकि वहां भारतीय नेटवर्क काम नहीं करता।
 
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- फोटो : अमर उजाला
एक खतरा और
मोर्चा टॉप में जाते समय जरा सी चूक किसी को भी सीधे 1000 मीटर गहरी खाई में झोंक सकती है। पिथौरागढ़ जिले के चीन सीमा स्थित व्यास घाटी (धारचूला से 90 किमी दूर) के सात दुर्गम गांवों बुदी, गर्ब्यांग, नपलच्यू, गुंजी, नाभी, रौंगकांग और कुटी के बाशिंदों की यही नियति है।
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- फोटो : अमर उजाला
तवाघाट से लिपुलेख तक काट दी गई सड़क
पिछले दिनों रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के हाथों हुए उद्घाटन के बाद अमर उजाला संवाददाता ने व्यास घाटी का जायजा लिया तो वहां के जनजीवन की ये कठिनाइयां सामने आईं। लोग सड़क बनने से खुश हैं लेकिन ये भी कहते हैं कि संचार, बिजली-पानी और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में ये खुशी अधूरी है।

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- फोटो : अमर उजाला
पहले आईटीबीपी के संचार तंत्र का था सहारा
रौंगकांग निवासी ज्योति रोकली और नरेंद्र रोकली ने बताया कि पहले तो आईटीबीपी के संचार तंत्र के जरिये भी वह अपने परिजनों से फोन पर संपर्क कर लिया करते थे लेकिन पिछले दो साल से डीएसपीटी संचार व्यवस्था बंद होने से ऐसा भी नहीं कर पाते। अब उनको जरूरत होने पर छियालेख जाकर वहां 500 मीटर ऊंची चोटी मोर्चा टॉप नापनी पड़ती है। वहां से नेपाली नेटवर्क के जरिये परिजनों से संपर्क हो पाता है।
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- फोटो : अमर उजाला
केवल नेपाली नेटवर्क ही करता है काम
मोर्चा टॉप में नेपाल के सुनसेरा गांव में स्थित नमस्ते कंपनी का सिग्नल आता है। सुनसेरा गांव सड़क मार्ग से लगभग 100 किलोमीटर दूर है। गांव की हवाई दूरी लगभग 5 किलोमीटर होगी। गर्ब्यांग निवासी सतीश सिंह और बूंदी निवासी निक्स रायपा ने बताया की मित्र राष्ट्र नेपाल के चीन सीमा के दुर्गम छांगरु गांव में पिछले 5 से 6 सालों से नमस्ते और स्काई कंपनी के टॉवर लगे हैं। पिछले साल तक छांगरु गांव में वाईफाई सेट से नेपालवासी दार्चुला और अन्य जगहों पर वीडियोकॉलिंग से बात करते थे।
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जंग से कम नहीं था चट्टानों को काटना
छियालेख से आगे का इलाका नोटिफाइड एरिया में शामिल है। यहां आईटीबीपी के जवानों को अपना परिचय पत्र दिखाने के बाद आगे जाने की अनुमति मिलती है। छियालेख से गर्ब्यांग और नपलच्यू के बीच छिती नामक स्थान पर सड़क कम चौड़ी है। वजह है यहां की कठोर चट्टानें। इन कठोर चट्टानों को काटकर सीमा तक सड़क बनना भी किसी चमत्कार से कम नहीं लग रहा था।
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