कीचड़ और दलदल था इसलिए जूते उतारकर हाथ में ले लिए और नंगे पांव आगे बढ़े। रोड पूरी तरह बंद थी। पहाड़ी पर घास और पेड़ पकड़कर गोरी नदी के किनारे-किनारे चार किलोमीटर पैदल चलकर शेराघाट पहुंचे। गोरी नदी के किनारे जोखिम देखकर ये कल्पना नहीं थी कि यहां भी कोई गांव हो सकता है। शेराघाट में डीएम मिले, वे भी आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा सके। शेराघाट से टांगा गांव जो रास्ता जा रहा था वह करीब डेढ़ से दो फीट था, जिसमें एक ही आदमी एक समय में जा सकता था। जरा सी चूक हुई कि जान से हाथ धो बैठने जैसी स्थिति थी। तेज बारिश और फिसलन भरे इस मार्ग पर 300 मीटर आगे बढ़े। फिर एक नदी में उतरकर 200 मीटर चले फिर एक छोटा सा रास्ता मिला जो दलदल से भरा हुआ था।