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पिथौरागढ़ आपदा: नीचे खाई और ऊपर से गिरती 'मौत', पढ़ें उस दिल दहला देने वाले मंजर की ग्राउंड रिपोर्ट...

Tue, 21 Jul 2020 01:40 AM IST
अलका त्यागी भक्तदर्शन पांडे/संजू पंत, अमर उजाला, पिथौरागढ़
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- फोटो : अमर उजाला
उत्तराखंड में मालपा हादसे के 22 साल बाद एक फिर अमर उजाला संवाददाता अपनी जान जोखिम में डालकर सबसे पहले भूस्खलन से तबाह हुए टांगा गांव वासियों का दर्द जानने पहुंचे। गांव का मंजर सच में दिल दहला देने वाला था। जिधर नजर जा रही थी उधर, भूस्खलन के बाद मलबा ही मलबा नजर आ रहा था। संवाददाता ग्रामीणों से बातचीत कर ही रहे थे कि 20 मीटर की दूरी पर तेज आवाज के साथ पूरी जमीन दरक गई। थोड़ा और इधर-उधर होते तो उनके साथ भी हादसा हो सकता था। मौके पर विधायक हरीश धामी मिले जो प्रदेश सरकार और प्रशासन से काफी नाराज नजर आए। 
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- फोटो : अमर उजाला
संवाददाता भक्त दर्शन बताते हैं हादसे की जानकारी तो सुबह मिल गई थी। संजू पंत के साथ हम लोगों ने मौके पर जाने की तैयारी की। नेटवर्क समस्या देखते हुए अलग-अलग कंपनियों के सिम और पावर बैंक भी रख लिया। हमसे पहले भी कुछ मीडिया वाले मौके लिए रवाना हो गए थे। मैं पिथौरागढ़ से करीब 10:30 बजे निकाला और संजू पंत से ओगला में मिलने की बात हुई। ओगला करीब एक बजे पहुंचा। इसके बाद संजू के साथ उनकी कार से मौके लिए रवाना हुए। 
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- फोटो : अमर उजाला
बारिश लगातार जारी थी, ऐसे में आगे बढ़ते जा रहे थे। मुनस्यारी-मदकोट मार्ग करीब सात जगह बंद था। किसी तरह लुंगती के आगे ज्योलीगाड़ नाले के पास पहुंचे। नाला काफी उफान पर था। हमने अपनी गाड़ी वहीं छोड़ दी। फिर वहां से स्थानीय निवासी गंगा सिंह के साथ भारी बारिश और भूस्खलन के बीच पैदल ही आगे बढ़ चले। अन्य मीडिया के लोग तो आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा सके। ऐसे में हमें भी एक बार लगा कि गलत आ गए लेकिन फिर हिम्मत जुटाकर आगे बढ़ चले। 

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- फोटो : अमर उजाला
कीचड़ और दलदल था इसलिए जूते उतारकर हाथ में ले लिए और नंगे पांव आगे बढ़े। रोड पूरी तरह बंद थी। पहाड़ी पर घास और पेड़ पकड़कर गोरी नदी के किनारे-किनारे चार किलोमीटर पैदल चलकर शेराघाट पहुंचे। गोरी नदी के किनारे जोखिम देखकर ये कल्पना नहीं थी कि यहां भी कोई गांव हो सकता है। शेराघाट में डीएम मिले, वे भी आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा सके। शेराघाट से टांगा गांव जो रास्ता जा रहा था वह करीब डेढ़ से दो फीट था, जिसमें एक ही आदमी एक समय में जा सकता था। जरा सी चूक हुई कि जान से हाथ धो बैठने जैसी स्थिति थी। तेज बारिश और फिसलन भरे इस मार्ग पर 300 मीटर आगे बढ़े। फिर एक नदी में उतरकर 200 मीटर चले फिर एक छोटा सा रास्ता मिला जो दलदल से भरा हुआ था। 
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- फोटो : अमर उजाला
उसे पार करके एक गेट पर पहुंचे तो लगा कि टांगा गांव आ गए लेकिन गंगा सिंह ने बताया कि अभी 156 खड़ी सीढ़ियां चढ़ने के बाद एक किलोमीटर और पैदल चलने के बाद टांगा गांव आएगा। हम सीढ़ियां चढ़कर करीब सवा पांच बजे ऊपर पहुंचे तो चारों ओर सन्नाटा ही सन्नाटा था। पेड़ गिरे हुए थे और बोल्डर पड़े थे। नीचे गहरी खाईं थी ऊपर से मलबा भी आ रहा था, ऐसे में पेड़ पर रेंगकर गांव पहुंचे तो गांव कहीं नजर ही नहीं आ रहा था। यहां नींबू और माल्टा के पेड़ थे जो नजर नहीं  आ रहे थे। हम लोग पूरी तरह कीचड़ से सने हुए थे। 
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- फोटो : अमर उजाला
मौके पर एसडीआरएफ की टीम और स्थानीय लोग हमारी ओर ही देख रहे थे। दो एसडीआरएफ के जवानों ने पानी दिया तब जाकर हमने हाथ मुंह धोए और खबरों का संकलन शुरू किया। हम लोगों ने जब ग्रामीणों को बताया कि अमर उजाला से हैं तो महिलाएं रो पड़ीं और कहां कि अब यकीन हो गया है कि हमारी आवाज सरकार तक पहुंचेगी। एक घंटे गांव में रुकने और ग्रामीणों से बात करने के बाद अंधेरे में मोबाइल फोन की रोशनी से एक बार फिर जान जोखिम में डालकर शेराघाट पहुंचे। यहां पर डीएम और एसएसपी ने अमर उजाला से मौके के हालात पता किए। पैदल ही रुंगटी पहुंचे, वहां से अपनी गाड़ी से वापसी की।
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