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समुद्र तल से 7000 फीट की ऊंचाई पर 191 साल पुराना कुआं बुझा रहा प्यास, एक्सक्लूसिव तस्वीरें देखें...

Wed, 30 Dec 2020 11:43 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal सुनील सिलवाल, अमर उजाला, मसूरी
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- फोटो : amar ujala
पहाड़ों पर कुआं बनाना बेहद श्रमसाध्य और खर्चीला है। अगर बन भी जाए तो इससे लगातार पानी मिलने की गारंटी नहीं है। क्योंकि पहाड़ में भूजल तो बहुत गहराई पर मिलता है। लेकिन हैरत की बात यह है कि पहाड़ों की रानी मसूरी के हाथी पांव क्षेत्र में समुद्र तल से 7000 फीट की ऊंचाई पर स्थित एक कुआं 191 साल बाद भी लोगों की प्यास बुझा रहा है। इस कुएं का निर्माण 1829 में किया गया था।
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- फोटो : amar ujala
अंग्रेजों की प्यास बुझाने के बाद अब इस कुएं से स्थानीय लोग पानी भर रहे हैं। माना जाता है कि मसूरी के हर चौक और गली में अतीत का गौरवशाली इतिहास छुपा है। इसी का एक नमूना मसूरी शहर से करीब पांच किलोमीटर दूर पार्क स्टेट में 7000 फीट की उंचाई पर स्थित यह कुआं है। कहा जाता है कि जब अंग्रेज इस क्षेत्र में आए तो हाथी पांव क्षेत्र में कहीं भी पीने के पानी की व्यवस्था नहीं थी।
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- फोटो : amar ujala
इस समस्या को देखते हुए 1829 में तत्कालीन अंग्रेज जनरल विश ने इस कुंए का निर्माण कराया। भारत के सर्वेयर जनरल जार्ज एवरेस्ट ने भी इस कुएं के पानी का इस्तेमाल किया। सर जार्ज की प्रयोगशाला इसी क्षेत्र में थी। उन्होंने देश-दुनिया की ऊंची चोटियों का सर्वे भी यहीं से किया। हाथी पांव निवासी 83 वर्षीय रुप सिंह कठैत कहते हैं कि अंग्रेजों के जमाने से लोग कुएं के पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं।

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- फोटो : amar ujala
कठैत कहते हैं कि पहाड़ में इतनी ऊंचाई पर कुएं बहुत कम देखने को मिलते हैं। समय के साथ अब कुएं में पानी भी कम हो गया है। उन्होंने कहा कि अगर कुएं का रखरखाव सही से हो तो सदियों तक यह ऐसे ही लोगों की प्यास बुझा सकता है। मान्यता है कि इस कुएं में पीछे मुड़कर सिक्का डालने से मनोकामना पूरी होती है। रूप सिंह कठैत ने बताया कि वह छोटी उम्र से इसे देखते आ रहे हैं।  आज भी लोग उनकी दुकान से कुएं में डालने के लिए सिक्के लेकर जाते हैं।
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- फोटो : amar ujala
वहीं, मसूरी के अंग्रेजी लेखक गणेश सैली भी इस बात का समर्थन करते हैं। उनका कहना है कि पुरानी मान्यता है कि कुएं में कोई अंगूठी या सिक्का डालने से मनोकामना पूरी होती है। आज भी इस कुएं में लोग पीछे मुड़कर सिक्का डालते हैं। इससे कुएं का नाम विशिंग वेल भी पड़ गया है।
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